प्रातः स्मरण स्तोत्रम् (शङ्कराचार्य)
प्रातः स्मरण स्तोत्रम् संस्कृत में – आदि शंकराचार्य के नाम से प्रचलित "प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं" आदि तीन श्लोक और फलश्रुति, पूरा पाठ।
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अंतिम जाँच:
- रचयिता और परंपरा
परंपरा में इसे आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है।
- कब पढ़ा जाता है
भक्त इसे नित्य पूजा में या देवता के विशेष दिन पर पढ़ते हैं।
इस पाठ के बारे में
यह प्रातः स्मरण स्तोत्र आदि शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन श्लोकों में प्रातःकाल हृदय में स्थित आत्मतत्त्व का स्मरण, मन-वाणी से परे परमेश्वर का भजन और पुरुषोत्तम को नमन है, और चौथे श्लोक में पाठ की महिमा बताई गई है। इसे प्रातःकाल उठते ही पढ़ने की परम्परा है।
पाठ
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः ॥ १ ॥अर्थ
सुबह मैं हृदय में चमकते आत्म-तत्त्व का स्मरण करता हूँ — जो सत्-चित्-सुख है, परमहंसों की गति है, तुरीय है, जो स्वप्न, जागृत और सुषुप्ति को सदा जानता है; वह निष्कल ब्रह्म मैं हूँ, पंच भूतों का समूह नहीं।
प्रातर्भजामि मनसो वचसामगम्यं
वाचो विभान्ति निखिला यदनुग्रहेण ।
यन्नेतिनेतिवचनैर्निगमा अवोचु-
स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्र्यम् ॥ २ ॥अर्थ
सुबह मैं उन्हें भजता हूँ जो मन और वाणी की पहुँच से परे हैं, जिनकी कृपा से सब वाणियाँ चमकती हैं, जिन्हें वेदों ने 'नेति नेति' (यह नहीं, यह नहीं) कहकर बताया — उन्हें देवों के देव, अजन्मे, अच्युत और आदि कहते हैं।
प्रातर्नमामि तमसः परमर्कवर्णं
पूर्णं सनातनपदं पुरुषोत्तमाख्यम् ।
यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूर्तौ
रज्ज्वां भुजङ्गम इव प्रतिभासितं वै ॥ ३ ॥अर्थ
सुबह मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ जो अंधकार से परे, सूर्य जैसे वर्ण वाले, पूर्ण, सनातन पद और पुरुषोत्तम नाम वाले हैं — जिन अनंत मूर्ति में यह सारा जगत रस्सी में साँप की तरह दिखता है।
श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम् ।
प्रातः काले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम् ॥ ४ ॥अर्थ
स्तोत्र के अनुसार तीनों लोकों के आभूषण ये तीन पवित्र श्लोक जो सुबह पढ़ता है, वह परम पद को जाता है।
॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रातःस्मरणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
अर्थ
इस प्रकार श्री गोविंद भगवत्पाद के शिष्य, परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री शंकर भगवान की रचना प्रातः स्मरण स्तोत्र पूरा हुआ।
इस पाठ के बारे में
सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (आदि शंकराचार्य)।
पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।
