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मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई – मीराबाई का प्रसिद्ध कृष्ण-भक्ति पद, संपूर्ण मूल पाठ।

हर खंड कम से कम दो स्रोतों से मिलाया गया है

अंतिम जाँच:

रचयिता और परंपरा

मीराबाई की रचना।

कब पढ़ा जाता है

इसे कृष्ण-भजन, जन्माष्टमी और सत्संग में गाया जाता है।

इस पाठ के बारे में

यह मीराबाई का प्रसिद्ध पद है, जिसमें वे घोषणा करती हैं कि मोर-मुकुटधारी गिरधर गोपाल के सिवा उनका कोई नहीं। इसमें कुल-मर्यादा और लोकलाज छोड़कर संतों के संग प्रेम-भक्ति की बेल सींचने का भाव है।

पाठ

  1. मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई ।

    अर्थ

    मेरे तो बस गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं।

  2. जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई ।
    तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई ॥

    अर्थ

    जिनके सिर पर मोर-मुकुट है, वही मेरे पति हैं। पिता, माता, भाई, बंधु — इनमें कोई मेरा अपना नहीं।

  3. छाँड़ि दई कुल की कानि कहा करिहै कोई ।
    संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई ॥

    अर्थ

    मैंने कुल की मर्यादा छोड़ दी है, अब कोई क्या कर लेगा? संतों के पास बैठ-बैठकर मैंने लोक-लाज खो दी है।

  4. चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई ।
    मोती मूँगे उतार बनमाला पोई ॥

    अर्थ

    मैंने रंगीन चुनरी के टुकड़े कर दिए और साधारण लोई ओढ़ ली; मोती-मूँगे उतारकर वनफूलों की माला पिरो ली।

  5. अँसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई ।
    अब तो बेल फैल गई आणंद फल होई ॥

    अर्थ

    आँसुओं के जल से सींच-सींचकर मैंने प्रेम की बेल बोई; अब वह बेल फैल गई है और उस पर आनंद के फल लग रहे हैं।

  6. दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोई ।
    माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई ॥

    अर्थ

    मैंने दूध की मथनी बड़े प्रेम से बिलोई और माखन निकाल लिया; अब छाछ कोई और पिए — यानी सार मैंने ले लिया, बाकी संसार के लिए है।

  7. भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई ।
    दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही ॥

    अर्थ

    भक्ति देखकर मैं प्रसन्न हुई, संसार की दशा देखकर रोई। दासी मीरा कहती है: हे लाल गिरधर, अब मुझे तार दो।

इस पाठ के बारे में

सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (मीराबाई)।

पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।