मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई – मीराबाई का प्रसिद्ध कृष्ण-भक्ति पद, संपूर्ण मूल पाठ।
हर खंड कम से कम दो स्रोतों से मिलाया गया है
अंतिम जाँच:
- रचयिता और परंपरा
मीराबाई की रचना।
- कब पढ़ा जाता है
इसे कृष्ण-भजन, जन्माष्टमी और सत्संग में गाया जाता है।
इस पाठ के बारे में
यह मीराबाई का प्रसिद्ध पद है, जिसमें वे घोषणा करती हैं कि मोर-मुकुटधारी गिरधर गोपाल के सिवा उनका कोई नहीं। इसमें कुल-मर्यादा और लोकलाज छोड़कर संतों के संग प्रेम-भक्ति की बेल सींचने का भाव है।
पाठ
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई ।
अर्थ
मेरे तो बस गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं।
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई ।
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई ॥अर्थ
जिनके सिर पर मोर-मुकुट है, वही मेरे पति हैं। पिता, माता, भाई, बंधु — इनमें कोई मेरा अपना नहीं।
छाँड़ि दई कुल की कानि कहा करिहै कोई ।
संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई ॥अर्थ
मैंने कुल की मर्यादा छोड़ दी है, अब कोई क्या कर लेगा? संतों के पास बैठ-बैठकर मैंने लोक-लाज खो दी है।
चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई ।
मोती मूँगे उतार बनमाला पोई ॥अर्थ
मैंने रंगीन चुनरी के टुकड़े कर दिए और साधारण लोई ओढ़ ली; मोती-मूँगे उतारकर वनफूलों की माला पिरो ली।
अँसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई ।
अब तो बेल फैल गई आणंद फल होई ॥अर्थ
आँसुओं के जल से सींच-सींचकर मैंने प्रेम की बेल बोई; अब वह बेल फैल गई है और उस पर आनंद के फल लग रहे हैं।
दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोई ।
माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई ॥अर्थ
मैंने दूध की मथनी बड़े प्रेम से बिलोई और माखन निकाल लिया; अब छाछ कोई और पिए — यानी सार मैंने ले लिया, बाकी संसार के लिए है।
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई ।
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही ॥अर्थ
भक्ति देखकर मैं प्रसन्न हुई, संसार की दशा देखकर रोई। दासी मीरा कहती है: हे लाल गिरधर, अब मुझे तार दो।
इस पाठ के बारे में
सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (मीराबाई)।
पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।
