हनुमान साठिका
हनुमान साठिका – 'जय जय जय हनुमान अडंगी' से आरम्भ होने वाली साठ चौपाइयों की स्तुति, दोहा और सवैया सहित सम्पूर्ण पाठ।
हर खंड कम से कम दो स्रोतों से मिलाया गया है
अंतिम जाँच:
- रचयिता और परंपरा
गोस्वामी तुलसीदास की रचना।
- कब पढ़ा जाता है
इसका पाठ विशेष रूप से मंगलवार को किया जाता है।
इस पाठ के बारे में
हनुमान साठिका साठ चौपाइयों की अवधी स्तुति है, जिसमें हनुमान जी के जन्म, बाल-लीला और रामायण के प्रमुख प्रसंगों का वर्णन है। परम्परा में इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना माना जाता है; अंतिम पंक्तियों और दोहों में उनका नाम आता है।
पाठ
जय जय जय हनुमान अडंगी । महावीर विक्रम बजरंगी ॥
जय कपीश जय पवन कुमारा । जय जगबन्दन सील अगारा ॥
जय आदित्य अमर अबिकारी । अरि मरदन जय-जय गिरधारी ॥
अंजनि उदर जन्म तुम लीन्हा । जय-जयकार देवतन कीन्हा ॥अर्थ
हे अटल हनुमान, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; हे महावीर, पराक्रमी बजरंगी, वानरराज, पवनकुमार, जगत से वंदित, शील के भंडार, आपकी जय हो। हे आदित्य जैसे तेजस्वी, अमर, विकार-रहित, शत्रुओं का मर्दन करने वाले, पर्वत उठाने वाले, आपकी जय हो। आपने अंजना के गर्भ से जन्म लिया, तब देवताओं ने जय-जयकार किया।
बाजे दुन्दुभि गगन गम्भीरा । सुर मन हर्ष असुर मन पीरा ॥
कपि के डर गढ़ लंक सकानी । छूटे बंध देवतन जानी ॥
ऋषि समूह निकट चलि आये । पवन तनय के पद सिर नाये ॥
बार-बार अस्तुति करि नाना । निर्मल नाम धरा हनुमाना ॥अर्थ
आकाश में गंभीर नगाड़े बजे, देवताओं के मन में हर्ष और असुरों के मन में पीड़ा हुई। वानर के डर से लंका का गढ़ काँप उठा, और देवताओं ने जान लिया कि उनके बंधन छूटेंगे। ऋषियों के समूह पास आए और पवन-पुत्र के चरणों में सिर झुकाया; बार-बार अनेक स्तुतियाँ करके उन्होंने निर्मल नाम 'हनुमान' रखा।
सकल ऋषिन मिलि अस मत ठाना । दीन्ह बताय लाल फल खाना ॥
सुनत बचन कपि मन हर्षाना । रवि रथ उदय लाल फल जाना ॥
रथ समेत कपि कीन्ह अहारा । सूर्य बिना भए अति अंधियारा ॥
विनय तुम्हार करै अकुलाना । तब कपीस की अस्तुति ठाना ॥अर्थ
सब ऋषियों ने मिलकर यह विचार किया और बताया कि लाल फल खाना है। यह सुनकर वानर का मन प्रसन्न हुआ, और उन्होंने उदय होते सूर्य के रथ को लाल फल समझा। रथ सहित सूर्य को निगल लिया, तब सूर्य के बिना बहुत अंधेरा हो गया। सब व्याकुल होकर विनती करने लगे और वानरराज की स्तुति की।
सकल लोक वृतान्त सुनावा । चतुरानन तब रवि उगिलावा ॥
कहा बहोरि सुनहु बलसीला । रामचन्द्र करिहैं बहु लीला ॥
तब तुम उन्हकर करेहू सहाई । अबहिं बसहु कानन में जाई ॥
असकहि विधि निजलोक सिधारा । मिले सखा संग पवन कुमारा ॥अर्थ
सब लोकों का हाल सुनाया गया, तब चतुर्मुख ब्रह्मा ने सूर्य को उगलवाया। फिर कहा: हे बलवान, सुनो, रामचंद्र बहुत लीलाएँ करेंगे; तब तुम उनकी सहायता करना, अभी जाकर वन में रहो। ऐसा कहकर ब्रह्मा अपने लोक चले गए, और पवनकुमार अपने साथियों से मिले।
खेलैं खेल महा तरु तोरैं । ढेर करैं बहु पर्वत फोरैं ॥
जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई । गिरि समेत पातालहिं जाई ॥
कपि सुग्रीव बालि की त्रासा । निरखति रहे राम मगु आसा ॥
मिले राम तहं पवन कुमारा । अति आनन्द सप्रेम दुलारा ॥अर्थ
वे खेल-खेल में बड़े-बड़े पेड़ तोड़ते और बहुत से पर्वत फोड़कर ढेर कर देते। जिस पर्वत पर वानर दौड़कर पैर रखते, वह पर्वत सहित पाताल चला जाता। वानर सुग्रीव बालि के डर से राम का मार्ग आशा से देखते रहे; वहाँ पवनकुमार राम से मिले, जिन्होंने बड़े आनंद और प्रेम से उन्हें दुलारा।
मनि मुंदरी रघुपति सों पाई । सीता खोज चले सिरु नाई ॥
सतयोजन जलनिधि विस्तारा । अगम अपार देवतन हारा ॥
जिमि सर गोखुर सरिस कपीसा । लांघि गये कपि कहि जगदीशा ॥
सीता चरण सीस तिन्ह नाये । अजर अमर के आसिस पाये ॥अर्थ
रघुपति से मणि वाली अँगूठी पाकर वे सिर झुकाकर सीता की खोज में चले। सौ योजन फैला समुद्र, जो अगम और अपार था और जिससे देवता भी हार गए थे, उसे वानरराज 'जगदीश' कहकर गाय के खुर के गड्ढे जैसा लाँघ गए। उन्होंने सीता के चरणों में सिर झुकाया और अजर-अमर होने का आशीर्वाद पाया।
रहे दनुज उपवन रखवारी । एक से एक महाभट भारी ॥
तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा । दहेउ लंक कोप्यो भुज बीसा ॥
सिया बोध दै पुनि फिर आये । रामचन्द्र के पद सिर नाये ॥
मेरु उपारि आप छिन माहीं । बांधे सेतु निमिष इक मांहीं ॥अर्थ
उपवन की रखवाली में एक से एक भारी महाबली राक्षस थे; उन्हें मारकर वानरराज ने लंका जलाई, जिससे बीस भुजाओं वाला (रावण) क्रोधित हुआ। सीता को ढाँढस देकर वे लौटे और रामचंद्र के चरणों में सिर झुकाया। फिर पल भर में पर्वत उखाड़कर एक क्षण में सेतु बाँध दिया।
लछमन शक्ति लागी उर जबहीं । राम बुलाय कहा पुनि तबहीं ॥
भवन समेत सुषेन लै आये । तुरत सजीवन को पुनि धाये ॥
मग महं कालनेमि कहं मारा । अमित सुभट निसिचर संहारा ॥
आनि संजीवन गिरि समेता । धरि दीन्हों जहं कृपा निकेता ॥अर्थ
जब लक्ष्मण की छाती में शक्ति लगी, तब राम ने बुलाकर कहा; आप घर सहित (वैद्य) सुषेण को ले आए और तुरंत संजीवनी के लिए दौड़े। मार्ग में कालनेमि को मारा और अनगिनत राक्षस योद्धाओं का संहार किया; संजीवनी को पर्वत सहित लाकर कृपा के धाम (राम) के सामने रख दिया।
फनपति केर सोक हरि लीन्हा । वर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा ॥
अहिरावण हरि अनुज समेता । लै गयो तहां पाताल निकेता ॥
जहां रहे देवि अस्थाना । दीन चहै बलि काढ़ि कृपाना ॥
पवनतनय प्रभु कीन गुहारी । कटक समेत निसाचर मारी ॥अर्थ
आपने शेषावतार (लक्ष्मण) का शोक हर लिया; देवताओं ने फूल बरसाकर जय-जयकार किया। अहिरावण हरि (राम) को छोटे भाई सहित पाताल के अपने घर ले गया, जहाँ देवी का स्थान था और वह तलवार निकालकर बलि देना चाहता था। तब प्रभु ने पवन-पुत्र को पुकारा, और आपने सेना सहित राक्षस को मार डाला।
रीछ कीसपति सबै बहोरी । राम लषन कीने यक ठोरी ॥
सब देवतन की बन्दि छुड़ाये । सो कीरति मुनि नारद गाये ॥
अछयकुमार दनुज बलवाना । कालकेतु कहं सब जग जाना ॥
कुम्भकरण रावण का भाई । ताहि निपात कीन्ह कपिराई ॥अर्थ
आपने भालुओं और वानरों के स्वामियों को लौटाया और राम-लक्ष्मण को एक जगह मिलाया। सब देवताओं को बंधन से छुड़ाया — यह कीर्ति नारद मुनि ने गाई। बलवान दानव अक्षयकुमार और कालकेतु को सारा जगत जानता है; रावण के भाई कुंभकर्ण को भी वानरराज ने गिरा दिया।
मेघनाद पर शक्ति मारा । पवन तनय तब सो बरियारा ॥
रहा तनय नारान्तक जाना । पल में हते ताहि हनुमाना ॥
जहं लगि भान दनुज कर पावा । पवन तनय सब मारि नसावा ॥
जय मारुत सुत जय अनुकूला । नाम कृसानु सोक सम तूला ॥अर्थ
मेघनाद ने शक्ति चलाई, तब पवन-पुत्र और भी बलवान हुए। नारांतक नाम का (रावण का) पुत्र था, उसे हनुमान ने पल में मार डाला। जहाँ तक दानवों का प्रकाश (प्रभाव) था, पवन-पुत्र ने सबको मारकर नष्ट कर दिया। हे मारुत-सुत, हे अनुकूल रहने वाले, आपकी जय हो; आपका नाम शोक रूपी रुई के लिए आग के समान है।
जहं जीवन के संकट होई । रवि तम सम सो संकट खोई ॥
बन्दि परै सुमिरै हनुमाना । संकट कटै धरै जो ध्याना ॥
जाको बांध बामपद दीन्हा । मारुत सुत व्याकुल बहु कीन्हा ॥
सो भुजबल का कीन कृपाला । अच्छत तुम्हें मोर यह हाला ॥अर्थ
जहाँ जीवन में संकट हो, वह संकट सूर्य के सामने अंधेरे की तरह मिट जाता है — ऐसा साठिका में कहा गया है। जो बंधन में पड़कर हनुमान का स्मरण करे और ध्यान धरे, उसका संकट कटता है। जिस (रावण) ने आपको बायाँ पैर बाँधकर रखा, उसे मारुत-सुत ने बहुत व्याकुल किया; हे कृपालु, आपके रहते मेरी यह दशा क्यों — आपने अपने भुजबल का क्या किया?
आरत हरन नाम हनुमाना । सादर सुरपति कीन बखाना ॥
संकट रहै न एक रती को । ध्यान धरै हनुमान जती को ॥
धावहु देखि दीनता मोरी । कहौं पवनसुत जुगकर जोरी ॥
कपिपति बेगि अनुग्रह करहु । आतुर आइ दुसै दुख हरहु ॥अर्थ
इंद्र ने आदर से आपका नाम 'आर्त-हरन' (दुखियों का दुख हरने वाले) बताया। पाठ के अनुसार जो यति हनुमान का ध्यान धरे, उसका रत्ती भर भी संकट नहीं रहता। हे पवन-सुत, मेरी दीनता देखकर दौड़ आइए — मैं दोनों हाथ जोड़कर कहता हूँ। हे वानरराज, जल्दी कृपा कीजिए, तुरंत आकर दुख हरिए।
राम सपथ मैं तुमहिं सुनाया । जवन गुहार लाग सिय जाया ॥
यश तुम्हार सकल जग जाना । भव बन्धन भंजन हनुमाना ॥
यह बन्धन कर केतिक बाता । नाम तुम्हार जगत सुखदाता ॥
करौ कृपा जय जय जग स्वामी । बार अनेक नमामि नमामी ॥अर्थ
मैं आपको राम की शपथ सुनाता हूँ, जिस पुकार पर आप सीता के लिए गए थे। आपका यश सारा जगत जानता है — हनुमान संसार के बंधन तोड़ने वाले हैं; यह छोटा-सा बंधन तो कुछ भी नहीं, आपका नाम जगत को सुख देने वाला है। हे जगत के स्वामी, कृपा कीजिए, आपकी जय हो, मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।
भौमवार कर होम विधाना । धूप दीप नैवेद्य सुजाना ॥
मंगल दायक को लौ लावे । सुन नर मुनि वांछित फल पावे ॥
जयति जयति जय जय जग स्वामी । समरथ पुरुष सुअन्तरजामी ॥
अंजनि तनय नाम हनुमाना । सो तुलसी के प्राण समाना ॥अर्थ
मंगलवार को धूप, दीप और नैवेद्य के साथ होम की विधि करें; पाठ के अनुसार जो मंगल देने वाले (हनुमान) में लौ लगाता है, वह — मनुष्य हो या मुनि — मनचाहा फल पाता है। हे जगत के स्वामी, समर्थ पुरुष, अंतर्यामी, आपकी जय हो; अंजना-पुत्र हनुमान तुलसी के लिए प्राणों के समान हैं।
दोहा
जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान ।
राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण ॥अर्थ
हे वानरराज सुग्रीव, आपकी जय हो; हे अंगद और हनुमान, आपकी जय हो; राम, लक्ष्मण और सीता सहित आप सदा कल्याण कीजिए।
दोहा
बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान ।
ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण ॥अर्थ
मंगलवार को इस हनुमान-नाम की वंदना करें; पाठ के अनुसार जो मनुष्य (दृढ़ता से) ध्यान धरता है, वह कल्याण का पद पाता है।
दोहा
जो नित पढ़ै यह साठिका, तुलसी कहैं बिचारि ।
रहै न संकट ताहि को, साक्षी हैं त्रिपुरारि ॥अर्थ
तुलसी विचारकर कहते हैं: पाठ के अनुसार जो रोज यह साठिका पढ़ता है, उसका कोई संकट नहीं रहता — त्रिपुरारि (शिव) इसके साक्षी हैं।
सवैया
आरत बन पुकारत हौं कपिनाथ सुनो विनती मम भारी ।
अंगद औ नल-नील महाबलि देव सदा बल की बलिहारी ॥
जाम्बवन्त् सुग्रीव पवन-सुत दिबिद मयंद महा भटभारी ।
दुःख दोष हरो तुलसी जन-को श्री द्वादश बीरन की बलिहारी ॥अर्थ
हे वानरनाथ, मैं दुखी होकर पुकारता हूँ, मेरी भारी विनती सुनिए। अंगद, नल-नील, महाबली देव, जाम्बवान, सुग्रीव, पवन-पुत्र, द्विविद और मयंद — इन महान योद्धाओं के बल पर मैं न्योछावर हूँ। इस तुलसीदास के दुख और दोष हरिए; मैं इन बारह वीरों पर बलिहारी जाता हूँ।
इस पाठ के बारे में
सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (गोस्वामी तुलसीदास)।
पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।
