दशरथ कृत शनि स्तोत्र
दशरथ कृत शनि स्तोत्र — पद्मपुराण में वर्णित "नमः कृष्णाय नीलाय" से आरम्भ होने वाली शनि देव की स्तुति, पूर्ण संस्कृत पाठ।
हर खंड कम से कम दो स्रोतों से मिलाया गया है
अंतिम जाँच:
- रचयिता और परंपरा
परंपरा में यह पाठ राजा दशरथ (पद्मपुराण) से जुड़ा है।
- कब पढ़ा जाता है
भक्त इसे प्रायः शनिवार को और शनि पूजा के समय पढ़ते हैं।
इस पाठ के बारे में
यह शनि देव की स्तुति है जो पद्मपुराण (उत्तरखण्ड, अध्याय ३३) में राजा दशरथ के मुख से कही गई है। कथा के अनुसार रोहिणी-शकट भेदन के प्रसंग में दशरथ ने इन श्लोकों से शनि देव की स्तुति की थी।
पाठ
दशरथ उवाच
नमः कृष्णाय नीलाय शितिकंठनिभाय च ।
नमः कालाग्निरूपाय कृतांताय च वै नमः ॥ १ ॥अर्थ
राजा दशरथ कहते हैं: कृष्ण (काले) और नील रंग वाले, शिव के नीले कंठ जैसे शनि को नमस्कार; कालाग्नि रूप और कृतांत (अंत करने वाले) को नमस्कार।
दशरथ उवाच
नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते ॥ २ ॥अर्थ
दुबले शरीर वाले, लंबी दाढ़ी और जटा वाले को नमस्कार; बड़े नेत्रों वाले, सूखे पेट और भयानक आकृति वाले को नमस्कार।
दशरथ उवाच
नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नमः ।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥अर्थ
विशाल शरीर और घने रोम वाले को नमस्कार; लंबे, सूखे और काल जैसे दाँतों वाले, आपको नमस्कार है।
दशरथ उवाच
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥ ४ ॥अर्थ
गहरी आँखों वाले, जिन्हें देखना कठिन है, आपको नमस्कार; घोर, रौद्र, भीषण और कपाल धारण करने वाले को नमस्कार।
दशरथ उवाच
नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुख नमोऽस्तु ते ।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥ ५ ॥अर्थ
सबको ग्रसने वाले, बलीमुख, आपको नमस्कार है; हे सूर्य-पुत्र, भास्कर के पुत्र, भय देने वाले, आपको नमस्कार है।
दशरथ उवाच
अधोदृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।
नमो मंदगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥अर्थ
नीचे दृष्टि रखने वाले, आपको नमस्कार; संवर्तक, आपको नमस्कार; धीमी चाल वाले, आपको नमस्कार; तलवारधारी, आपको नमस्कार है।
दशरथ उवाच
तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः ॥ ७ ॥अर्थ
तप से जले हुए शरीर वाले, सदा योग में लगे रहने वाले, सदा भूखे और कभी तृप्त न होने वाले को नमस्कार।
दशरथ उवाच
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मजसूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥ ८ ॥अर्थ
हे ज्ञान रूपी नेत्रों वाले, कश्यप के पौत्र, आपको नमस्कार है; स्तोत्र में कहा गया है कि प्रसन्न होने पर आप राज्य देते हैं और रुष्ट होने पर उसी क्षण छीन लेते हैं।
दशरथ उवाच
देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः ।
त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यांति समूलतः ॥ ९ ॥अर्थ
स्तोत्र के अनुसार देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और नाग — आपकी (कठोर) दृष्टि पड़ने पर सब जड़ से नष्ट हो जाते हैं।
दशरथ उवाच
प्रसादं कुरु मे देव वरार्होऽहमुपागतः ।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः ॥ १० ॥अर्थ
हे देव, मुझ पर कृपा कीजिए; मैं वर पाने योग्य होकर आपके पास आया हूँ। इस प्रकार स्तुति किए जाने पर तब महाबली ग्रहराज सौरि (शनि) —
इस पाठ के बारे में
सार्वजनिक (कॉपीराइट से मुक्त): पारंपरिक पाठ (राजा दशरथ (पद्मपुराण))।
पारंपरिक पाठ वैसा ही दिया गया है जैसा प्रचलित छपे संस्करणों में मिलता है। इस पेज का हर अर्थ हमने अपने शब्दों में लिखा है।
