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बृहस्पतिवार (गुरुवार) व्रत

गुरुवार (बृहस्पतिवार) का व्रत भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की पूजा के साथ रखा जाता है। यहाँ इसकी विधि, केले के पेड़ की पूजा, कथा, मंत्र, नियम और उद्यापन की जानकारी है।

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अंतिम जाँच:

यह व्रत कब रखा जाता है

हर गुरुवार को। भगवान विष्णु के व्रत में लोग 11, 21 या 51 गुरुवार का संकल्प लेते हैं। बृहस्पति ग्रह के व्रत को अनुराधा नक्षत्र वाले गुरुवार से शुरू करने की बात कही जाती है; इसे 7 या 16 गुरुवार रखा जाता है, और 16 के संकल्प में 17वें गुरुवार को उद्यापन होता है।

अगली तारीख़ें:

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इस व्रत के बारे में

गुरुवार को बृहस्पतिवार भी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की पूजा के साथ व्रत रखा जाता है। पूजा में पीले रंग का विशेष स्थान है: पीले वस्त्र, पीले फूल, पीला चंदन, और चने की दाल व गुड़ का भोग। इस दिन केले के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाकर उसकी पूजा भी की जाती है।

परंपरा में इस व्रत के दो रूप बताए जाते हैं: भगवान विष्णु का गुरुवार व्रत और बृहस्पति ग्रह का व्रत। दोनों के नियम मिलते-जुलते हैं, पर व्रतों की संख्या और शुरू करने का दिन अलग है।

पूजा सामग्री

  • पीले वस्त्र
  • पीले फूल
  • पीला चंदन या हल्दी
  • चने की दाल और गुड़
  • मुनक्का
  • केले
  • तुलसी दल
  • अक्षत
  • धूप और दीपक
  • जल में मिलाने के लिए शक्कर

विधि, क्रम से

हर चरण पूरा होने पर उस पर निशान लगाएँ। निशान दिन खत्म होने तक इसी डिवाइस पर रहते हैं।

मंत्र

ॐ बृहस्पतये नमः

अर्थ: देवगुरु बृहस्पति को नमस्कार। भगवान विष्णु के रूप में व्रत रखने वाले उनका द्वादशाक्षर मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भी जपते हैं।

जप शुरू करें KDD पंचांग में जप काउंटर खुलेगा: एक माला में 108।

व्रत कथा

कथा पढ़ें

पुराने समय में एक राजा था जो बहुत दानी था। वह रोज़ मंदिर जाता और ब्राह्मणों व गरीबों की मदद करता। पर उसकी रानी को यह अच्छा नहीं लगता था। वह न पूजा करती, न दान देती, और राजा को भी दान करने से रोकती थी।

एक गुरुवार राजा शिकार पर गया था। तभी बृहस्पति देव एक साधु का वेश बनाकर महल के द्वार पर भिक्षा माँगने आए। रानी ने कहा, महाराज, मैं इस दान-पुण्य से तंग आ गई हूँ; कोई ऐसा उपाय बताइए कि यह सारा धन ही न रहे। साधु ने समझाया कि धन से बहुत अच्छे काम हो सकते हैं, पर रानी नहीं मानी। तब साधु बोले, अगर यही चाहती हो, तो गुरुवार को पीली मिट्टी से सिर धोना, उसी दिन कपड़े धोना और राजा से बाल कटवाने को कहना। यह कहकर वे चले गए।

रानी ने वैसा ही किया। तीन गुरुवार बीतते-बीतते महल का सारा धन चला गया, और घर में खाने तक की कमी हो गई। राजा दूसरे देश चला गया और जंगल से लकड़ी काटकर बेचने लगा। रानी और उसकी दासी घर में भूखी रहने लगीं।

जंगल में एक दिन राजा उदास बैठा था, तब बृहस्पति देव साधु के रूप में उसके पास आए। उन्होंने बताया कि रानी ने गुरुवार का अनादर किया, इसी से यह दशा हुई। उन्होंने कहा कि गुरुवार को लकड़ी बेचकर जो पैसे मिलें, उनसे थोड़ा चना और मुनक्का लाकर बृहस्पति देव की पूजा करना और कथा कहना। राजा ने कहा कि इतने कम पैसों में यह कैसे होगा, तो साधु बोले, गुरुवार को तुम्हें लकड़ी के दाम दुगने मिलेंगे। राजा ने ऐसा ही किया, और उसके दिन सुधरने लगे।

पर एक गुरुवार वह कथा करना भूल गया। उसी दिन उस देश के राजा के भोज में वह देर से पहुँचा और महल में ले जाया गया, जहाँ उस पर हार चुराने का झूठा आरोप लगा और उसे कैद कर लिया गया। कैद में उसने फिर बृहस्पति देव को याद किया और द्वार पर मिले पैसों से चना-मुनक्का मँगाकर कथा की। उसी रात उस देश के राजा को सपने में सच बताया गया, और हार भी खूँटी पर टँगा मिल गया। राजा को सम्मान के साथ छोड़ दिया गया।

इधर रानी की दासी मदद माँगने रानी की बहन के घर गई। उस दिन गुरुवार था और बहन कथा सुन रही थी, इसलिए उसने कोई उत्तर नहीं दिया, क्योंकि कथा के बीच न उठा जाता है, न बोला जाता है। बाद में बहन स्वयं रानी के पास आई और उसे गुरुवार का व्रत बताया: केले की जड़ में विष्णु जी की पूजा, चना-मुनक्का का भोग, पीला भोजन और कथा। रानी और दासी ने श्रद्धा से व्रत शुरू किया, और घर में फिर से अन्न और धन आ गया।

जब राजा घर लौटा, तो उसने देखा कि रानी ने नगर में बाग, कुएँ और धर्मशालाएँ बनवाई हैं। दोनों ने आगे भी गुरुवार का व्रत रखा। कथा के अनुसार, जो श्रद्धा से यह व्रत रखता और कथा सुनता है, उस पर बृहस्पति देव की कृपा रहती है।

नियम और किन बातों से बचें

  • दिन में एक बार बिना नमक का पीला, सात्विक भोजन करें।
  • इस दिन केले के पेड़ की पूजा होती है, इसलिए व्रत रखने वाले केला नहीं खाते; केले और चने की दाल का दान किया जाता है।
  • प्याज़, लहसुन, मांस और मदिरा से दूर रहें।
  • कथा के अनुसार गुरुवार को सिर धोना, कपड़े धोना और बाल कटवाना ठीक नहीं माना जाता।
  • जिन्हें स्वास्थ्य के कारण उपवास कठिन हो, वे डॉक्टर की सलाह से ही व्रत रखें।

उद्यापन

संकल्प के गुरुवार पूरे होने पर उद्यापन किया जाता है; 16 गुरुवार के संकल्प में 17वें गुरुवार को। परंपरा में पुरोहित के मार्गदर्शन में पूजा और हवन होता है, बची हुई पूजा सामग्री आचार्य को दी जाती है, ब्राह्मणों और विवाहित जोड़ों को भोजन कराकर वस्त्र, फल, मिठाई और दक्षिणा दी जाती है, और केले या पीपल के पेड़ में जल चढ़ाया जाता है। उद्यापन की पूरी विधि अपने पुरोहित से पूछकर करें।

लोग अक्सर पूछते हैं

गुरुवार व्रत में केला क्यों नहीं खाते?

इस दिन केले के पेड़ की पूजा की जाती है, इसलिए परंपरा के अनुसार व्रत रखने वाले केला नहीं खाते, बल्कि उसका दान करते हैं।

गुरुवार व्रत में नमक खा सकते हैं?

परंपरा के अनुसार इस व्रत में दिन में एक बार बिना नमक का पीला भोजन किया जाता है।

गुरुवार व्रत कितने रखें?

भगवान विष्णु के व्रत में 11, 21 या 51 गुरुवार का संकल्प लिया जाता है। बृहस्पति ग्रह के व्रत में 7 या 16 गुरुवार बताए जाते हैं; 16 के संकल्प में 17वें गुरुवार को उद्यापन होता है।