कुबेर साधना रहस्य

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कुबेर साधना रहस्य-एक वार महा ऋषि पुलस्य के सिर पे बहुत बड़ी विपता आ पढ़ी और उन को उस समय में दरिद्रता का सहमना करना पड़ा। जिस के चलते उस राज्य की प्रजा काल और सूखे की चपेट में या गई और धन न होने की वजह से चारो तरफ लोग भूख और गरीबी से बेहाल हो उठे तब महा ऋषि पुलस्य ने इस से उबरने के लिए कुबेर की सहायता लेनी चाही, क्यू के वह जानते थे के कुबेर के बिना धन नहीं आ सकता मगर दैवी नियमो के चलते कुबेर सीधे धन नहीं दे सकते थे! इस लिए महा ऋषि पुलस्य ने गणपती भगवान की साधना की तो गणपती बप्पा ने कुबेर को हुकम दिया के महा ऋषि की सहायता करे तो कुबेर ने कहा के अगर आप कुबेर यंत्र का स्थापन कर मेरे नो रूप में से किसी की भी साधना करेंगे तो धन की बरसात होने लगेगी। इस लिए महा ऋषि ने गणपती भगवान से प्रार्थना की और गणपती भगवान ने उन्हे कुबेर के 9 दिव्य रूप के मंत्र दिये। महा ऋषि ने कुबेर यंत्र स्थापन कर कुबेर के 9 दिव्य रूप की साधना संपन की और प्रजा को दरिद्रता से उबारा साधना संपन होने से धन की बरसात होने लगी और चारो तरफ खुशहाली फ़ेल गई! इन 9 दिव्य रूपों की साधना आज भी हमारे शास्त्रों में है और जो एक वार इन साधनायो को कर लेता है उस के जीवन में कोई अभाव नहीं रहता

क्या है यह कुबेर के 9 रूप

  1. उग्र कुबेर — यह कुबेर धन तो देते ही है साथ में आपके सभी प्रकार के शत्रुओ का भी हनन कर देते है!
  2. पुष्प कुबेर –यह धन प्रेम विवाह ,प्रेम में सफलता ,मनो वर प्राप्ति ,स्न्मोहन प्राप्ति ,और सभी प्रकार के दुख से निवृति के लिए की जाती है!
  3. चंद्र कुबेर — इन की साधना धन एवं पुत्र प्राप्ति के लिए की जाती है ,योग्य संतान के लिए चंदर कुबेर की साधना करे!
  4. पीत कुबेर — धन और वाहन सुख संपति आदि की प्राप्ति के लिए पीत कुबेर की साधना की जाती है !इस साधना से मनो वाशित वाहन और संपति की प्राप्ति होती है!
  5. हंस कुबेर — अज्ञात आने वाले दुख और मुकदमो में विजय प्राप्ति के लिए हंस कुबेर की साधना की जाती है!
  6. राग कुबेर — भोतिक और अधियात्मक हर प्रकार की विधा संगीत ललित कलाँ और राग नृत्य आदि में न्पुनता और सभी प्रकार की परीक्षा में सफलता के लिए राग कुबेर की साधना फलदायी सिद्ध होती है!
  7. अमृत कुबेर — हर प्रकार के स्वस्थ लाभ रोग मुक्ति ,धन और जीवन में सभी प्रकार के रोग और दुखो के छुटकारे के लिए अमृत कुबेर की साधना दिव्य और फलदायी है !
  8. प्राण कुबेर — धन है पर कर्ज से मुक्ति नहीं मिल रही वेयर्थ में धन खर्च हो रहा हो तो प्राण कुबेर हर प्रकार के ऋण से मुक्ति दिलाने में सक्षम है !इन की साधना साधक को सभी प्रकार के ऋण से मुक्ति देती है !
  9. धन कुबेर — सभी प्रकार की कुबेर साधनयों में सर्व श्रेष्ठ है जीवन में हम जो भी कर्म करे उनके फल की प्राप्ति और धन आदि की प्राप्ति के लिए और मनोकामना की पूर्ति हेतु और भाग्य अगर साथ न दे रहा हो तो धन कुबेर की साधना सर्व श्रेष्ठ कही गई है !

नमस्तुभ्यम् महा मंत्र म् दायिने शिव रुपिणे, ब्रह्म ज्ञान प्रकाशाय संसार दु:ख तारिणे ।
अती सौम्याय विध्याय वीराया ज्ञान हारिने, नमस्ते कुल नाथाय कुल कौलिन्य दायिने ।।
शिव तत्व प्रकाशाय ब्रह्म तत्व प्रकाशइने, नमस्ते गुरुवे तुभ्यम् साधकाभय दायिने ।
अनाचाराचार भाव बोधाय भाव हेतवे, भावाभाव विनिर्मुक्त मुक्ती दात्रे नमो नम: ।।
नमस्ते सम्भवे तुभ्यम् दिव्य भाव प्रकाशइने, ज्ञानआनन्द स्वरूपाय विभ्वाय नमो नम: ।
शिवाय शक्ति नाथाय सच्चीदानन्द रुपिणे, कामरूप कामाय कामकेलीकलात्मने ।।
कुल पूजोपदेशाय कुलाचारस्वरुपिने, आरक्थ नीजतत्शक्ति वाम भाग विभूतये ।
नमस्तेतु महेशाय नमस्तेतु नमो नम:, यह एदम पठत् स्तोत्रम सधाको गुरु दिङ मुख
प्रातरुथाय देवेशी ततोविध्या प्रशिदति, कुल सम्भव पूजा मादौ योन: पठेएदम ।
विफला तश्य पूजाश्यात विचारआय कल्प्यते, एती श्री कुब्जिका तन्त्रे गुरु स्तोत्रम साम्पूर्णम ।।

महाराज वैश्रवण कुबेर की उपासना से संबंधित मंत्र, यंत्र, ध्यान एवं उपासना आदि की सारी प्रक्रियाएं श्रीविद्यार्णव, मंत्र महार्णव, मंत्र महोदधि, श्रीतत्वनिधि तथा विष्णुधर्मोत्तरादि पुराणों में निर्दिष्ट हैं। तदनुसार इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदक्षरात्मक छोटे−बड़े अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं। मंत्रों के अलग−अलग ध्यान भी निर्दिष्ट हैं। इनके एक मुख्य ध्यान−श्लोक में इन्हें मनुष्यों के द्वारा पालकी पर अथवा श्रेष्ठ पुष्पक विमान पर विराजिए दिखाया गया है। इनका वर्ण गारुडमणि या गरुणरत्न के समान दीप्तिमान पीतवर्णयुक्त बताया गया है और समस्त निधियां इनके साथ मूर्तिमान होकर इनके पार्श्व भाग में निर्दिष्ट हैं। ये किरीट−मुकुटादि आभूषणों से विभूषित हैं।

इनके एक हाथ में श्रेष्ठ गदा तथा दूसरे हाथ में धन प्रदान करने की वर मुद्रा सुशोभित है। ये उन्नत उदर युक्त स्थूल शरीर वाले हैं। ऐसे भगवान शिव के परम सुहृदय भगवान कुबेर का ध्यान करना चाहिए−

कुबेर का ध्यान यह मंत्र पढ़कर लगाएं

मनुजवाहम्विमानवरस्थितं गरुडरत्ननिभं निधिनायकम्।

शिवसखं मुकुटादिविभूषितं वरगदे दधतं भज तुन्दिलम्।।

मंत्र महार्णव तथा मंत्र महोदधि आदि में निर्दिष्ट महाराज कुबेर के कुछ मंत्र इस प्रकार हैं−

  1. अष्टाक्षरमंत्र− ओम वैश्रवणाय स्वाहा।
  2. षोडशाक्षरमंत्र− ओम श्री ओम ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः।
  3. पंचत्रिंशदक्षरमंत्र− ओम यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।

इसी प्रकार वहां बालरक्षाकर मंत्र−यंत्र भी निर्दिष्ट हैं, जिसमें ‘अया ते अग्ने समिधा’ आदि का प्रयोग होता है। यह मंत्र बालकों के दीर्घायुष्य, आरोग्य, नैरुज्यादि के लिए बहुत उपयोगी है। इस प्रकार बालकों के आरोग्य लाभ के लिए भी भगवान कुबेर की उपासना विशेष फलवती होती है। प्रायरू सभी यज्ञ−यागादि, पूजा−उत्सवों तथा दस दिक्पालों के पूजन में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में कुबेर की विधिपूर्वक पूजा होती है। यज्ञ−यागादि तथा विशेष पूजा आदि के अंत में षोडशोपचार पूजन के अनन्तर आर्तिक्य और पुष्पांजलि का विधान होता है। पुष्पांजलि में तथा राजा के अभिषेक के अंत में ‘ओम राजाधिराजाय प्रसह्म साहिने’ इस मंत्र का विशेष पाठ होता है, जो महाराज कुबेर की ही प्रार्थना का मंत्र है। महाराज कुबेर राजाओं के भी अधिपति हैं, धनों के स्वामी हैं, अतः सभी कामना फल की वृष्टि करने में वैश्रवण कुबेर ही समर्थ हैं।

व्रतकल्पद्रुम आदि व्रत ग्रंथों में कुबेर के उपासक के लिए फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी से वर्ष भर प्रतिमास शुक्ल त्रयोदशी को कुबेर व्रत करने के अनेक विधान निर्दिष्ट हैं। इससे उपासक धनाढ्य तथा सुख−समृद्धि से संपन्न हो जाता है और परिवार में आरोग्य प्राप्त होता है। सारांश में कहा जा सकता है कि कुबेर की उपासना ध्यान से मनुष्य का दुःख दारिद्र्य दूर होता है और अन्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। शिव के अभिन्न मित्र होने से कुबेर के भक्त की सभी आपत्तियों से रक्षा होती है और उनकी कृपा से साधक में आध्यात्मिक ज्ञान−वैराग्य आदि के साथ उदारता, सौम्यता, शांति तथा तृप्ति आदि सात्विक गुण भी स्वाभाविक रूप से संनिविष्ट हो जाते हैं।

अब सब प्रकार की सिद्धि देन वाले कुबेर के मंत्र को कहता हूँ –

‘यक्षाय’ पद बोलकर, ‘कुबेराय’, फिर ‘वैश्रवणाय धन’ इन पदों का उच्चारण कर ‘धान्याधिपतये धनधान्य समृद्धिम में देहि दांपय’, फिर ठद्वय (स्वाहा) लगासे से यह ३५ अक्षरों का कुबेर मंत्र निष्पन्न होता है ॥१०५-१०६॥

इस मंत्र के विश्रवा ऋषि हैं, बृहती छन्द है तथा शिव के मित्र कुबेर इसके देवता ॥१०७॥

विमर्श – कुबेरमंत्र का स्वरुप इस प्रकार है – यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिम मे देहि दापय स्वाहा (३५)।

विनियोग – अस्य श्रीकुबेरमंत्र स्य विश्रवाऋषिर्बृहतीच्छन्दः शिवमित्रं धनेश्वरो देवताऽत्मनोऽभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ॥१०५-१०७॥

मंत्र के ३, ४, ५, ८, ८, एवं ७ वर्णों से षडङ्गन्यास करे । फिर अलकापुरी में विराजमान कुबेर का इस प्रकार ध्यान करे ॥१०८॥

विमर्श – न्यास विधि – यक्षाय हृदयाय नमः, कुबेराय शिरसे स्वाहा,

वैश्रवणाय शिखायै वषट्, धनधान्यधिपतये कवचाय हुम्,

धनधान्यसमृद्धिम मे नेत्रत्रयाय वौषट्, देहि दापय स्वाहा अस्त्राय फट् ॥१०८॥

अब अलकापुरी में विराजमान कुबेर का ध्यान कहते हैं – मनुष्य श्रेष्ठ, सुन्दर विमान पर बैठे हुये, गारुडमणि जैसी आभा वाले, मुकुट आदि आभूषणों से अलंकृत, अपने दोनो हाथो में क्रमशः वर और गदा धारण किए हुये, तुन्दिल शरीर वाले, शिव के मित्र निधीश्वर कुबेर का मैं ध्यान करता हूँ ॥१०९॥

इस मंत्र का एक लाख जप करना चाहिए । तिलों से उसका दशांश होम करना चाहिए तथा धर्मादि वाले पूर्वोक्त पीठ पर षडङ्ग दिक्पाल एवं उनके आयुधों का पूजन करना चाहिए ॥११०॥

अब काम्य प्रयोग कहते हैं – धन की वृद्धि के लिए शिव मंदिर में इस मंत्र का दस हजार जप करना चाहिए। बेल के वृक्ष के नीचे बैठ कर इस मंत्र का एक लाख जप करने से धन-धान्य रुप समृद्धि प्राप्त होती है ॥१११॥

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Gyanchand Bundiwal
Gemologist, Astrologer. Owner at Gems For Everyone and Koti Devi Devta.
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