जय धन्वन्तरि देवा – धन्वन्तरि आरती
जय धन्वन्तरि देवा – आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वन्तरि की आरती का पूरा पाठ, धनतेरस पूजा के लिए हिंदी में।
- रचयिता और परंपरा
- पारंपरिक पाठ।
- कब पढ़ा जाता है
- इसे विशेष रूप से धनतेरस (धन्वन्तरि त्रयोदशी) पर और उनकी पूजा के समय गाया जाता है।
इस पाठ के बारे में
यह आरती आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वन्तरि को समर्पित है, जो समुद्र मंथन के समय अमृत कलश लेकर प्रकट हुए माने जाते हैं।
पाठ
1
जय धन्वन्तरि देवा, जय धन्वन्तरि जी देवा ।
जरा-रोग से पीड़ित जन-जन सुख देवा ॥
जय धन्वन्तरि देवा ॥
अर्थ
हे धन्वंतरि देव, आपकी जय हो। आरती में प्रार्थना है कि बुढ़ापे और पीड़ा से दुखी हर व्यक्ति को आप सुख दें।
2
तुम समुद्र से निकले, अमृत कलश लिए ।
देवासुर के संकट आकर दूर किए ॥
जय धन्वन्तरि देवा ॥
अर्थ
आप अमृत का कलश लिए समुद्र से प्रकट हुए। कथा के अनुसार आपने आकर देवताओं और असुरों का संकट दूर किया।
3
आयुर्वेद बनाया, जग में फैलाया ।
सदा स्वस्थ रहने का, साधन बतलाया ॥
जय धन्वन्तरि देवा ॥
अर्थ
आपने आयुर्वेद रचा और उसे संसार में फैलाया। आपने सदा स्वस्थ रहने के उपाय बताए।
4
भुजा चार अति सुन्दर, शंख सुधा धारी ।
आयुर्वेद वनस्पति से शोभा भारी ॥
जय धन्वन्तरि देवा ॥
अर्थ
आपकी चार भुजाएँ अत्यंत सुंदर हैं और आप शंख और अमृत धारण करते हैं। आयुर्वेद की वनस्पतियों से आपकी शोभा बहुत बढ़ती है।
5
तुम को जो नित ध्यावे, रोग नहीं आवे ।
असाध्य रोग भी उसका, निश्चय मिट जावे ॥
जय धन्वन्तरि देवा ॥
अर्थ
आरती के अनुसार जो प्रतिदिन आपका ध्यान करता है, उस पर पीड़ा नहीं आती और कठिन से कठिन व्याधि भी मिट जाती है; यह आरती की श्रद्धा है, चिकित्सा का स्थान नहीं।
6
हाथ जोड़कर प्रभुजी, दास खड़ा तेरा ।
वैद्य-समाज तुम्हारे चरणों का घेरा ॥
जय धन्वन्तरि देवा ॥
अर्थ
हे प्रभु, आपका दास हाथ जोड़कर खड़ा है। वैद्यों का समाज आपके चरणों को घेरे हुए है।
7
धन्वन्तरिजी की आरती जो कोई नर गावे ।
रोग-शोक न आए, सुख-समृद्धि पावे ॥
जय धन्वन्तरि देवा ॥
अर्थ
आरती के अंतिम पद में कहा गया है कि जो कोई धन्वंतरि जी की आरती गाता है, उस पर रोग और शोक नहीं आते और वह सुख-समृद्धि पाता है।
यह पेज ऐप के अंदर है; वेबसाइट पर इसका पूरा पेज kotidevidevta.org/dhanvantari-aarti-jai-dhanvantari-deva/ है।