श्रावण मास माहात्म्य – श्रावण कामनापूर्ति साधनाएं

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श्रावण मास भगवान शिव का प्रियामास है, जिसमे श्रद्धा से पूजा साधना करने से भगवान शिव इच्छाओं को पूर्ण कर देते हैं। यदि जीवन में शिवत्व प्राप्त करना है तो श्रावण मास से अधिक कोई भी सिद्ध मुहूर्त नहीं है। इस पुण्य मुहूर्त की प्रतीक्षा केवल साधु-योगियों को ही नहीं हर साधक को रहती है।

शिव महिमा निराली है, प्रसन्न हुए तो कुबेर को देवताओं का कोषाध्यक्ष बना दिया। अश्विनी कुमारों को आयुर्वेद विद्या सौंप दी जो महामृत्युंजय स्वरूप होकर भीषण-से भीषण रोग से मुक्ति दे देते हैं। जीवन में श्रेष्ठता शिवत्व के माध्यम से ही प्राप्त हो सकता है, इसलिए इस मास में सम्पन्न किए जाने वाले हर प्रयोग-साधना सौभाग्यप्रद होती है। आइए, हम भी कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयोगों को सावन मास में प्रसन्न करें मनोकामना पूर्ण करें।

विषयसूची
  1. श्रावण मास माहात्म्य – श्रावण के सोमवार
  2. श्रावण के सिद्धिदायी चार सोमवार
  3. श्रावण मास माहात्म्य – पहला सोमवार
  4. श्रावण मास माहात्म्य – दूसरा सोमवार
  5. श्रावण मास माहात्म्य – तीसरा सोमवार
  6. श्रावण मास माहात्म्य – चौथा सोमवार
  7. श्रावण मास माहात्म्य – कुछ महत्वपूर्ण साधनाएं – भगवान् सिद्धेश्वर प्रयोग
  8. श्रावण मास माहात्म्य – प्रयोग विधि
  9. श्रावण मास माहात्म्य – सिद्धेश्वर मंत्र
  10. श्रावण मास माहात्म्य – सर्वव्याधि मोचन प्रयोग
  11. श्रावण मास माहात्म्य – सर्व कामना सिद्धि साधना
  12. श्रावण मास माहात्म्य – शिव पंचाक्षरी मंत्र साधना
  13. श्रावण मास माहात्म्य – मुक्ति प्राप्ति का प्रयोग
  14. श्रावण मास माहात्म्य – सुख-शांति व समृद्धि हेतु
  15. श्रावण मास माहात्म्य – विवाह बाधा निवारण प्रयोग
  16. श्रावण मास माहात्म्य – पुत्र प्राप्ति प्रयोग
  17. श्रावण मास माहात्म्य – कार्य सिद्धि प्रयोग

श्रावण मास माहात्म्य – श्रावण के सोमवार

भगवान् शिव को रमेश्वर कहा गया है। क्योंकि यह जीवन मे रस को प्रदान करने वाले हैं और जिस व्यक्ति के जीवन में रस नहीं है उस व्यक्ति का जीवन मृत तुल्य है।प्रतीक रूप में भगवान शंकर ने गंगा के तेज प्रवाह को अपनी जटाओं में धारण किया था और उनके शरीर से प्रवाहित होती हुई यह गंगा पूरे भारत वर्ष को जीवन रस से आप्लावित करती हुई निरंतर प्रवाहित हो रही है, सभी नदियां सूख सकती हैं, लेकिन गंगा की मूल धारा कभी भी सूख नहीं सकती है, इसका स्पष्ट तात्पर्य है कि भगवान शिव का अभिषेक किया हुआ जल पूरे जीवन को आत्लावित करता है। यही गंगा कहीं नर्मदा बन जाती है, कहीं ब्रह्मपुत्र तो कहीं हुगली, क्षिप्रा। इस प्रकार विभिन्न धाराओं में बहती हुई समुद्र में विलीन हो जाती है, ठीक इसी प्रकार मनुष्य का जीवन की पूर्णता रूपी समुद्र, जिसमें भगवान नारायण विराजमान हैं उस पूर्णत्व मोक्ष को प्राप्त करें, ही तो जीवन की वास्तविक गति है।

सृष्टि शिव को तमोगुण का अधिष्ठातृ देव और संहार शंक्ति का नियामक माना गया। संहार-सामग्री, भूत-प्रेम, सर्प, बिच्छू, कुत्ता, भेड़िया आदि-आदि पौराणिक शिव के पारिवारिक अंग है। इनका मुख्य उद्देश्य तत्वों की संहारपरकता तथा रूप-भयंकरता के प्रतिपादन में योगदान है। बैल की सवारी भी सी इसी प्रकार का एक अंश मानी जा सकती है, किंतु वृष का मुख्य अर्थ सभी मंगलकामनाओं का आवश्यक धर्म-तत्व माना गया है। इसका रूप भयंकर नहीं है। सिर पर जटामुकुट, द्वितीया के चंद्र का आभूषण, मस्तक में तृतीय नेत्र और नाग का यज्ञोपवीत, गले, कान, मणिबंध, पाद्गुल्फ और कटि में सर्पमाला का आभूषण, सभी सौंदर्य और भीषणता के प्रतीक हैं। कवियों द्वारा वर्णित शिव-पार्वती विवाह में शिव का यह श्रृंगार कविकुल के मनोविनोद-हास्य तथा श्रृंगार, भयानक रसों का सम्मिश्रण है।

भगवान शिव की उपासना करने वाला कोई भी साधक अपने जीवन में निराश नहीं हो सकता क्योंकि भगवान शंकर ता औढ़रदानी हैं। यदि व्यक्ति भगवान शिव को अपना आदर्श मान लें और निश्चय कर ले कि मैं शिव समान ही अपने जीवन को रसयुक्त रखूंगा और जीवन यात्रा में चाहे कितने भी दुख रूपी सर्प आएं उन दुखों को धारण करते हुए भी आनंद के साथ जीवन यात्रा करूंगा तो भी मनुष्य का जीवन शांत और सर्वसुखों से युक्त बन जाता है।


रुद्राक्ष को भगवान शिव का प्रसाद माना जाता है. मान्यता है कि यह दिव्य बीज या फिर कहें दिव्य रत्न भगवान शिव के आसुओं से बना है। विभिन्न प्रकार के रत्नों में रुद्राक्ष का अपना एक अलग महत्व है। भले ही यह तमाम तरह के रत्नों की तरह चमकीला न हो लेकिन इसका प्रभाव चमत्कारिक है क्योंकि यह भगवान शंकर को बहुत प्रिय है. यही कारण है कि दुनिया भर के शिव भक्त हमेशा इसे किसी न किसी रूप में इसे धारण किये रहते हैं। 100% प्राकृतिक और सर्टिफाइड रुद्राक्ष खरीदने के लिए आज ही संपर्क करें 08275555557 या हमारी वेबसाइट पर जाइये www.gemsforeveryone.com


श्रावण के सिद्धिदायी चार सोमवार

जैसा कि मैंने बताया श्रावण में चार महत्वपूर्ण सोमवार आ रहे हैं और ये सोमवार अपने आप में अद्वितीय योगों से सम्पन्न हैं। इन सोमवारों को की गई उपासनाएं एवं साधनाएं विशेष फल प्रदान करने वाली होती हैं। इन दिनों किए गए प्रयोग भी शीघ्र व सुपरिणाम देने वाले होते हैं। प्रत्येक सोमवार अमूल्य धरोहर है अतः हमें सभी सोमवारों का सदुपयोग करना चाहिए।

श्रावण मास माहात्म्य – पहला सोमवार

इस सोमवार को विशेष योग बन रहे हैं। ऐसे योगों से सम्पन्न होने की वजह से यह सोमवार अपने आप में सिद्धि दिवस और सिद्धयोग बन गया है, ऐसे महत्वपूर्ण योग में निम्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रयोग सम्पन्न किए जा सकते हैं –

  • लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी को घर में यथायित्व देने के लिए। नौकरी लगने, बेकारी दूर होने व नौकरी में पदोन्नति के लिए।
  • व्यापार वृद्धि, व्यापार में सफलता प्राप्ति के लिए।
  • ऋण समाप्त होने व निरंतर, आर्थिक उन्नति के लिए।
  • जीवन में सभी दृष्टियों से पूर्ण भौतिक सुख, सम्पन्नता एवं सफलता कल लिए।
  • स्वयं का मकान होने व वाहन प्राप्ति के लिए।
  • आकस्मिक धन प्राप्ति, भूमि से द्रव लाभ, लाटरी आदि से उत्तम योग के लिए।

आर्थिक दृष्टि से पूर्ण अनुकूलता और सफलता प्राप्ति के लिए। शास्त्रा की दृष्टि से ये दिन इस प्रकार के प्रयोगों के लिए अद्वितीय हैं। अतः साधको को इसका पूरा लाभ उठाना चाहिए।

श्रावण मास माहात्म्य – दूसरा सोमवार

इस सोमवार को विलक्षण फल देने वाले योग बन रहे हैं जो कि अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। ऐसे ही योगों से सम्पन्न होने के कारण यह सोमवार भी अति महत्वपूर्ण है। अतः ऐसे महत्वपूर्ण योग से निम्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयोग सम्पन्न किए जा सकते हैं।

  • मनोवांछित पति या पत्नी प्राप्ति के लिए या इच्छित प्रेमी अथवा प्रेमिका को वश में करने के लिए।
  • मनोवांछित पुरुष या स्त्री को हमेशा-हमेशा के लिए अपने अनुकूल बनाने के लिए।
  • परिवार कलह दूर करने व गृहस्थ जीवन में पूर्ण अनुकूलता के लिए।
  • पितृ दोष, गहदोष, तांत्रिक दोष आदि समाप्त करने के लिए।
  • किसी भी प्रकार की साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिए।
  • आश्चर्यजनक भाग्योदय प्राप्ति के लिए।
  • भगवान शिव को प्रत्यक्ष कर उनके दर्शन करने एवं शिवमय होने के लिए।

उपरोक्त कार्यों की सिद्धि के लिए यह सोमवार अपने आप में अत्यधिक महत्वपूर्ण है और प्रत्येक साधक इस सोमवार का विशिष्ट तरीके से प्रयोग सम्पन्न कर लाभ उठा सकता है।

श्रावण मास माहात्म्य – तीसरा सोमवार

श्रावण मास का यह तीसरा सोमवार अपने आप में दुर्लभ और महत्वपूर्ण है। इस सोमवार को हरियाली तीज होने से इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। सौम्य योग से सम्पन्न होने के कारण इस सोमवार को जो भी प्रयोग किया जाता है, वह अपने आपमें सिद्धिदायक होता है। निम्न कार्यों के लिए और जीवन में सभी दृष्टियों से सफलता के लिए इस सोमवार का प्रयोग किया जाना चाहिए।

  • अखंड सौभाग्य प्राप्ति एवं पति या पत्नी की पूर्ण आयु के लिए
  • संतान प्राप्ति एवं पुत्र संतान के लिए।
  • संतान की सुरक्षा, सफलता एवं पुत्र की उन्नति के लिए।
  • कन्या के शीघ्र विवाह और उसके योग्य वर प्राप्ति के लिए।
  • प्रत्येक प्रकार की मनोकामना पूर्ति के लिए।
  • अकाल मृत्यु निवारण तथा घर में पूर्ण सुख-शांति के लिए।
  • पूर्ण सौंदर्य एवं यौवन प्राप्ति के लिए।

श्रावण मास माहात्म्य – चौथा सोमवार

श्रावण मास का यह चौथा और अंतिम सोमवार भी अति महत्वपूर्ण है। सिद्धियां प्राप्त करने की दृष्टि से यह अति महत्वपूर्ण दिवस है। इस सोमवार को प्रयोग करना समस्त विघ्नों को मिटाकर, सफलता माना है।

निम्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस सोमवार का प्रयोग किया जा सकता है।

  • शत्रु नाश के लिए।
  • शत्रुओं पर हावी होने व शत्रुओं को परास्त करने के लिए।
  • मुकदमें में पूर्ण सफलता प्राप्ति के लिए, शीघ्रातिशीघ्र फैसलें के लिए।
  • किसी भी प्रकार की राज्य बाधा, राज्य संकट आदि की समाप्ति के लिए।
  • भविष्य में किसी भी प्रकार की बाधा, अपमान भय की निवृत्ति के लिए।
  • दुर्घटना एवं अकाल मृत्यु निवारण के लिए।
  • छोटे बच्चों के स्वास्थ्य व आयु के लिए।
  • पूर्ण रोग मुक्ति एवं पारिवारिक सुख-समृद्धि के लिए।
  • बुढ़ापा रोकने एवं अकाल मृत्यु को समाप्त करने के लिए।

वस्तुतः ये चारों सोमवार भगवान् शिव की साधना से सम्बन्धित हैं और शिव साधना के द्वारा ही विशेष साधना सम्पन्न कर मनोवांछित उद्दश्यों की प्राप्ति की जा सकती है।

श्रावण मास माहात्म्य – कुछ महत्वपूर्ण साधनाएं – भगवान् सिद्धेश्वर प्रयोग

श्रावण मास भगवान शिव का सर्वाधिक अनुकूल मास है, शिव भक्त पूरे वर्ष-भर श्रावण के महीने की प्रतीक्षा करते रहते हैं। सर्व-सिद्धिप्रदायक प्रयोग का तात्पर्य उन समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति है, जो व्यक्ति की इच्छा होती है। साधक को चाहिए कि वह ‘हर-हर महादेव’ का घोष करते हुए पूर्ण श्रद्धा के साथ इस प्रयोग को सम्पन्न करे। इस प्रयोग से निश्चिय पुत्र-प्राप्ति, पुत्र-सुख और सौभाग्य वृद्धि तो होती ही है, रोगों के निवारण में भी यह प्रयोग अचूक है। भगवान शिव को वैद्यनाथ कहते हैं और इस प्रयोग से सम्पन्न जल का पान, यदि साधक एक महीने तक करे तो निश्चय ही वह समस्त प्रकार के रोगों से मुक्त हो सकता है।

भगवान शिव ने कामदेव पर विजय प्राप्त की थी और इसीलिए कमजोर और निर्बल मनुष्यों के लिए यह प्रयोग ‘संजीवनी’ की तरह है। जो इस प्रयोग को सम्पन्न कर लेता है, वह पूर्ण पौरुषवान बन जाता है।

स्त्रियों के लिए तो यह ‘हर गौरी’ प्रयोग है, जिसके माध्यम से वे इस प्रयोग को संपन्न कर सौभाग्य की कामना करती हैं, इस प्रयोग से पति की दीर्घायु प्राप्त होती है ओर उसके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। कुंवारी बालिकाएं इस प्रयोग को करने से मनोवांछित वर प्राप्त करने में सफल हो जाती हैं।

भगवान शिव को ‘रुद्र’ कहते हैं, जो कि शत्रुओं के संहारक हैं। इस प्रयोग को सम्पन्न करने से साधक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है, अपने विरोधियों पर हावी होता है और सभी दृष्टियों से सफलता प्राप्त कर पाता है। वास्तव में ही यह प्रयोग पूरे वर्ष का सौभाग्य प्रयोग है, जिसे प्रत्येक पुरुष और स्त्री को सम्पन्न करना चाहिए।

श्रावण मास माहात्म्य – प्रयोग विधि

पहले श्रावणी सोमवार को परिवार का मुखिया साधक या घर का कोई भी सदस्य स्नान कर शुद्ध, स्वच्छ वस्त्र धारण कर किसी पात्र में केसर से ‘ॐ नमः शिवाय’ लिख दे और उस पर भगवान ‘सिद्धेश्वर’ की स्थापना कर दें। सिद्धेश्वर तक विशेष प्रकार का ज्योतिलिंग है, जिसे घर में प्रतिष्ठत करना जीवन की पूर्णता है। विशेष मंत्रों से सिद्ध ऐसे सिद्धेश्वर ज्योतिलिंग को पात्र में स्थापित कर उसकी संक्षिप्त पूजा करें। केसर, गुलाल आदि चढ़ाएं।

इसके बाद हाथ में जल पात्र लेकर उसमें थोड़ा-सा कच्चा दूध मिला लें और स्वयं या पति-पत्नी दोनों धीरे-धीरे उस सिद्धेश्वर शिवलिंग पर ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण करते हुए जल चढ़ाएं। धीरे-धीरे पात्र में इतना जल चढ़ा देना चाहिए कि भगवान् सिद्धेश्वर का शिवलिंग उस जल में डूब जाए, उस पूरे दिन यह ज्योर्तिलिंग जल में डूबा रहे।

श्रावण मास माहात्म्य – सिद्धेश्वर मंत्र

।। ॐ ह्रीं ऐं हर गौर्यं रुद्राय अनंग रूपाय सिद्धिप्रदाय सिद्धेश्वराय नमः ।।

अब रुद्राक्ष माला से 108 बार इस मंत्र का जाप करें। इसके बाद भगवान शिव की आरती करें और प्रसाद चढ़ाएं। इस प्रसाद को बालकों में बांट दें।

अगले दिन उस जल का उपयोग घर के सभी सदस्य करें या जल किसी पात्र में लेकर थोड़ा-थोड़ा जल सभी पी लें इससे रोग निवृत्ति होती हैं। और बाकी जल को पूरे घर में छिड़क दें। इस साधना को प्रथम श्रावणी सोमवार को करें।

इस वर्ष यह श्रेष्ठतम और अद्वितीय प्रयोग है, प्रत्येक साधक को अपने घर में सिद्धेश्वर की स्थापना करनी ही चाहिए। आप स्वयं इस प्रयोग का चमत्कार और प्रभाव शीघ्र ही अनुभव करेंगे।

श्रावण मास माहात्म्य – सर्वव्याधि मोचन प्रयोग

सामग्रीः कार्यसिद्धि रुद्राक्ष, पारद मोती।

श्रावण के प्रथम सोमवार को लकड़ी के एक तख्ते पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर चावलों से ॐ बनाएं। उसके मध्य में घर में उपलब्ध शिवलिंग स्थापित करें। चारों ओर चार कलश स्थापित करें। ये कलश मिट्टी या चांदी के बने होने चाहिए। इनमे पीपल के पत्ते डालकर उन पर नारियल रखें। प्रत्येक कलश में पीपल के पांच पत्ते बने होने चाहिए। इस प्रकार से डालें कि उनके डंठल कलश के अंदर हों।

तत्पश्चात निम्न मन्त्र की 11 मालाएं जपें तो निश्चय ही साधक समस्त प्रकार की परेशानियों से मुक्त होता है और यदि साधक रोगी है तो वह रोगमुक्त हो जाता है।

मंत्र

ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं त्र्यम्बकं यजामहे सुगधिं पुष्टिवर्द्धनं भर्गोदेवस्य धीमहि उर्वारूकमिव वंधनाद धियो यो नः प्रचोदयात मृत्युर्मुक्षीयमामृतात।

इसमें यदि छोटे मनकों की रुद्राक्ष माला का प्रयोग किया जाए तो निश्चय ही सफलता मिलती है।

श्रावण मास माहात्म्य – सर्व कामना सिद्धि साधना

साधना सामग्री : सिद्धि चक्र, सर्वकार्य सिद्धि कल्प, रुद्राक्ष माला।

यदि आप पारिवारिक कलह, घर में पितृ दोष से परेशान है। और चाहते हैं कि गृहस्थ में पूर्ण अनुकूलता, लक्ष्मी का घर में स्थपित, ऋण से मुक्ति, निरंतर आर्थिक उन्नति, बेरोजगारी दूर हो श्रावण के सोमवार के प्रयोग से नहीं चूकना चाहिए। इसे स्त्री-पुरुष कोई भी कर सकता है।

विधि – सर्वप्रथम स्नान कर शुद्ध धोती/साड़ी या वस्त्र पहनकर पूर्व की ओर मुंह कर बैठे। अब अपने सामने बाजोट पर एक पात्र स्थापित करें व उससे सिद्धिप्रद चक्र, सर्वकार्य सिद्धि कल्प स्थापित करें। रुद्राक्ष माला भी साथ ही रखें।

अब अपने हाथ में थोड़ा सा जल लेकर अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु सकंल्प करें। मैं (अपना नाम, पिता का नाम, विवाहित स्त्रियां अपने पति का नाम लें, गौत्र व शहर का नाम बोलकर) अपने गुरु व इष्ट का ध्यान करते हुए अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति हेतु श्रावण मास साधना सम्पन्न कर रहा हूं। भगवान शिव मेरा पूजन सफल करें।

यह बोलकर जल छोड़ दें। फिर शुद्ध जल में थोड़ा-सा कच्चा दूध और गंगाजल मिलाकर ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का उच्चारण करते हुए सामग्री पर छिड़कें। अब यंत्र एवं सिद्धि चक्र पर केसर और कुमकुम की बिंदी लगाएं और पुष्प फल, बिल्व पत्र इत्यादि अर्पण करें। अबीर, गुलाल, अक्षता इत्यादि से सुसज्जित करें।

मंत्र

पंच तात्वाय पूर्ण कार्य सिद्धिं देहि देहि सदाशिवाय नमः।।

प्रत्येक सोमवार उपरोक्त मंत्र की 3 माला जपें। जाप के पश्चात सामग्री यों ही पूजा स्थान पर पात्र में रखी रहने दें। नित्य सुबह-सुबह दीप प्रज्जवलित करें। श्रावण मास के अंतिम दिन इस सामग्री को लाल वस्त्र में लपेटकर किसी शिव मंदिर में जाकर शिव चरणों में अर्पित कर दें। इस प्रकार साधक शीघ्र ही मनोवांछित सफलता प्राप्त करने में सफल हो पाता है।

श्रावण मास माहात्म्य – शिव पंचाक्षरी मंत्र साधना

‘नमः शिवाय’ मंत्र बहुत ही सीधा, सरल एवं सर्वगम्य यह मंत्र तेजस्वी एवं अत्यधिक प्रभावयुक्त क्रम में है। हमारे पूर्वज मंत्रों व साधारण बोलचाल में आने वाले शब्दों में भेद नहीं कर पाए, इसी का परिणाम है कि इन मंत्रों के रहस्य से हम हीन होकर क्षीण हो गए। कुछ जो हमारे उदात्त ऋषि हुए हैं, अपने मंत्रमय स्वरूप को पहचानकर अद्वितीय कहे गए हैं, वे सभी इस पंचाक्षर मंत्र की विशेषता से प्रभावित हैं।

यह पंचाक्षर मंत्र अल्पाक्षर होते हुए भी अपने गहनतम अर्थों को समाहित किए हुए हैं। जो जन्म-मृत्यु से रहित है जिसका कभी भी क्षय नहीं होता, सभी देव जिसे नमन करते हैं। गहनतम ध्यान में मग्न सभी पापों को हरण करने वाले, जिससे परे और कुछ भी नहीं है, सभी शास्त्रों का एक मात्र विषय, सर्वाभूषण, नीलकंठ जो सर्वत्र व्याप्त हैं, जो सर्वगुरु हैं वह शिव हैं।

पुराणों के अनुसार पुण्य-काल में वेदों एवं शास्त्रों की समस्त शक्ति इस पंचाक्षर मंत्र में समाहित होकर रहती है। पुनः सृष्टि-क्रम की दशा में नाभि-कमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने सृष्टि रचना काल, जिज्ञासावश भगवान नारायण से प्रार्थना की तो उन्होंने इस ‘पन्चक्षरी मंत्र’ का उपदेश दिया गया तथा भगवान ने इस मंत्र के विशेष रहस्यों से ब्रह्मा को अवगत कराया। फिर ब्रह्मा ने विशेष सिद्धि लाभ के लिए इसी मंत्र के द्वारा घोर तपस्या की तथा सृष्टि निर्माण में समर्थ हुए। तदन्तर अन्य ऋषिगण भी इस मंत्र की महत्ता को ब्रह्मा से प्राप्त करके प्रभावित हुए। पंचाक्षर मंत्र की सिद्धता के बाद और किसी मंत्र या साधना की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती, क्योंकि शिव ही साक्षात परब्रह्म हैं, वही परमानंद हैं, वही ज्ञान स्वरूप हैं। भगवान शंकर को प्रसन्न करने का यह पंचाक्षर मंत्र उत्तम साधन बताया गया है। इस प्रकार ‘नम शिवाय’ इस पंचाक्षर मंत्र की साधना प्रत्येक मनुष्य को यथानुकूल करनी ही चाहिए।

इस साधना के लिए सवा लाख मंत्र जाप करना चाहिए। जब भी साधना करनी हो साधक प्रातःकाल उठकर स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत होकर सात्विक एवं श्रद्धामय होकर साधना कक्ष में प्रवेश करें तथा सफेद या पीले रंग की धोती पहनकर, पीले आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठ जाएं। अपने सामने तांबे या स्टील की थाली में ‘पारदेश्वर शिवलिंग’ स्थापित करें। गंगाजल या शुद्ध जल के छींटे देकर किसी साफ वस्त्र से पोंछ दें तथा बाद में चंदन का तिलक लगाकर पुष्प चढ़ाएं। धूप, दीप, दिखाकर मिठाई का भोग लगाएं। मंत्र पूजा के बाद विनियाग करें, दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न संदर्भ पढ़ें बाद में इस जल को भूमि पर छोड़ दें।

अस्य श्री शिव मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषि अनुष्टुप छंदः श्री सदाशिव देव शक्तिम ‘म’ कीलकम ‘शिवाय’ बीजम् सदाशिव प्रीत्यर्थ जपे विनियोग।

इसके बाद साशक करन्यास तथा हृदयादिन्यास करें।

करन्यास

न – अंगुष्ठाभ्यां नमः।

मः – तर्जनीभ्यां स्वाहा।

शि – मध्यामाभ्यां वषट।

वा – अमामिकाभ्यां हूं।

य – कनिष्ठिकाभ्यां वौषट।

हृदयशक्ति न्यास

न – हृदयाय नमः।

मः – शिरसे स्वाहा।

शि – शिखायै वषट

वा – कवचाय हूं

या – नेत्रत्रयाय वौषट

‘ॐ नमः शिवाय’ अनादि शक्तये अस्त्राय फट।

ध्यान

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारं सारं भुजगेंद्रहारं

सदावसन्तं हृदयारविंदे भवं भवानी सहितं नमामि

इसके बाद स्फटिक माला से जाप प्रारम्भ करें। सवा लाख मंत्र जप पूर्ण होने के बाद दशांश हवन करके साधना पूरी करें। इस साधना की पूर्णता पर साधक को रोगनिवृत्ति, सौभाग्य की प्राप्ति तथा सुख एवं सम्पत्ति का लाभ होगा। साधना की समाप्ति पर शिवलिंग पूजा स्थान में स्थापित दें। और माला शिव मंदिर में शिवलिंग पर अर्पित कर दें।

श्रावण मास माहात्म्य – मुक्ति प्राप्ति का प्रयोग

सामग्री : मोक्षदा माला।

यह प्रयोग कोई भी साधक कर सकता है, साधक को चाहिए कि श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से यह प्रयोग प्रारंभ करें और श्रावण की पूर्णिमा को इसका समापन करें। साधक स्नान कर साफ धुले वस्त्र पहनकर पूर्व की तरफ मुंह कर आसन पर बैठ जाएं और सामने शिव प्रतिमा या चित्र रखें। चांदी या तांवे की तश्तरी में मोक्षदा माला स्थापित कर उसकी पूजा करें।

तत्पश्चात नीचे दिए गए निम्न प्राणरक्षक कवच का साधक नित्य 5 पाठ करें। मोक्षदा माला पहन लें। इस प्रकार नित्य प्रयोग करते हुए पूरे 30 दिन यह प्रयोग करें तो निश्चय ही साधक मरणोंपरांत शिव धाम जाता है और उसे अपने जीवन में अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता।

इस प्राणरक्षक कवच मुक्ति प्रप्ति कवच, शिव सायुज्य कवच भी कहा जाता है। यह कवच गोपनीय होने के साथ-साथ महत्वपूर्ण भी है। अतः इसका प्रयोग प्रत्येक साधक को अवश्य ही करना चाहिए।

विनियोग

भैरव उवाच-वक्ष्यामिदेव कवचं मंगलं प्राणरक्षकम आहेरात्रं महादेवक्षार्थ देवमण्डितम अस्य श्री महादेवकवचस्य वामदेव ऋषिः पंक्ति छन्द सौः बीजं रूद्रो देवता सर्वार्थसाधने विनियोगः।

यह विनियोग है अतः इसे एक बार ही पढ़ना है। अब नीचे कवच दिया जा रहा है जिसके पांच पाठ नित्य होने चाहिए।

कवच

रुद्रो मामग्रतः पातु पृष्ठतः पातु शंकरः
कपर्दी दक्षिणे पातु वामपार्श्वे तथा हरः ।।1।।
शिवः शिरसि मां पातु ललाटे नीलोलहितः
नेत्रं मे त्र्यम्बकः पातु बाहुयुग्मं महेश्वरः।।2।।
हृदये च महादेव ईश्वरश्च तथेदरे।
नाभौ कुक्षौ कटिस्थानने पदौ पातु महेश्वर।।3।।
सर्व रक्षतु भूतेशः सर्वगात्राणि मे हरः।।
पाशं शूलञ्च दिव्यास्त्रं खड्गंवज्र तथैव च ।।4।।
नमस्कारोमि भूतेश रक्ष मां जगदीश्वर।।
पापेभ्यो नरकेभ्यश्च त्राहि मां भक्तवात्सल।।5।।
जन्म मृत्युंजरा व्याधिकामक्रोधादपि प्रभो।।
लाभमहान्महादेव रक्ष मां त्रिदेश्वर।।6।।
त्वं गतिस्त्वं मतिश्चैव त्वं भूमिस्त्वं परायणः।।
कायेन मनसा वाचा त्वयि भक्तिर्दृढास्तु मे ।।7।।

क्रियोडडीश तंत्र में इस पाठ के बारे में बताया गया है कि यह पाठ अत्यंत गोपनीय होने के साथ-साथ तत्काल पूर्ण सफलता देने वाला है।

इत्येतद्रुद्रकवचं पाठनात्पाप नाशनम।
महादेवप्रसादेन भैरवेन च कीर्तितम।।
न तस्य पापं देहेषु न भयं तस्य विद्यते।
प्राप्नोति सुखरारोग्यं पुत्रमायुः-वर्द्धनम।।
पुत्रार्थी लाभते पुत्रान्धानार्थी धनमाप्नुयात।
विद्यार्थी लभते विद्यां मोक्षार्थी मोक्षदेव च।।
व्याधितो मुच्यते रोगाद बंधौ मुच्येत बंधनात।।
ब्रह्महत्यादि पापं च पठनादेव नश्यति।।

श्रावण मास माहात्म्य – सुख-शांति व समृद्धि हेतु

सामग्रीः पारद शिवलिंग, रुद्राक्ष, पारद मुद्रिका एवं रुद्राक्ष माला।

यह प्रयोग श्रावण के किसी भी सोमवार को प्रारंभ किया जा सकता है। यह सौभाग्य, बल, बुद्धि व मेधा, वृद्धि के लिए किया जाता है। इससे घर में आय के नवीन स्त्रोत बढ़ते हैं। परिवार में शांति का वातावारण बनता है।

नित्य क्रिया से निवृत होकर पूर्व/उत्तर की ओर मुख कर पवित्र आसन पर बैठें। पूजन सामग्री में बिल्व पत्र, पुष्प, गुलाब जल, इत्र, यज्ञोपवीत, मिष्ठान, दूध, घी, शहद, शक्कर, फल, दीपक, पहले से ही अपने पास रख लें।

फिर आप शांतचित होकर पूजा स्थान पर बैठें। अब एक पात्र में शिवलिंग, रुद्राक्ष व पारद मुद्रिका स्थापित करें। फिर दही, दूध, शक्कर व घी और गुलाब जल मिश्रित कर ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करते हुए इस पंचामृत को शिवलिंग पर अर्पित करें। तदन्तर साफ पानी से धोकर एक-एक विग्रह को अपने सामने बाजोट पर पुष्प अक आसन देकर विराजमान करें। इन तीनों परकेशर व अक्षत चढ़ाकर पुष्प चढ़ाएं, इत्र चढ़ाएं व शिवलिंग व यज्ञोपवीत चढ़ाएं। बिल्व पत्र समर्पित करें, फल चढ़ाएं सम्पूर्ण पूजा विधि करने तक ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप अनवरत करते रहें।

अब धूप-दीप दिखाएं। दीपक प्रज्वलित कर अपनी मनोकामना सिद्धि की प्रार्थना करते हुए रुद्राक्ष की माला में निम्न वरदायी मंत्र का जाप 11 माला जप करें।

मंत्र – ॐ रुद्राक्ष पशुपति नमः ।।

मंत्र जाप के पश्चात शिव जी की आरती सम्पन्न करें व कुछ पुष्प लेकर भगवान शिव के चरणों में चढ़ाएं व दोनों हाथ जोड़कर भगवान शिव से मन ही मन प्रार्थना करें कि वे सभी पर अपनी कृपा दृष्टि करें।

अब शिवलिंग को पूजा स्थान में ही रहने दें। रुद्राक्ष को घर का कोई भी पुरुष पूर्ण सफलता एवं विजय के लिए धारण कर ले। मुद्रिका को स्त्री धारण कर ले जिससे अखंड सौभाग्य, लक्ष्मी, शांति घर में बनी रहे। निश्चय ही आने वाले दिनों में घर में परिवर्तन महसूस होगा।

श्रावण मास माहात्म्य – विवाह बाधा निवारण प्रयोग

सामग्रीः कात्यायनी यंत्र एवं कात्यायनी माला।

कई जो संतान के विवाह में विलम्ब से दुखी हैं। इस कष्ट के निवारण हेतु पुत्र या पुत्री जिसके विवाह में अड़चनें आ रही हों उसे यह प्रयोग करना चाहिए।

विवाह की कामना रखने वाले साधक (लड़का या लड़की) को बाजोट पर ‘कात्यायनी यंत्र एवं कार्यसिद्धि माला’ को स्थापित करना चाहिए। विधिवत् यंत्र आदि का पूजन कर श्रावण के हर सोमवार को निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए।

मंत्र

हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकरप्रिया।
मां कुरु कल्याणि कान्ताकान्ता सुदुर्लभाम।।

लड़के के विवाह के लिए निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए।

मंत्र

पत्नी मनोरमां देहि मनोवृत्यानुसारिणीम।
तारिणी दुर्गसंसारसागरस्य कुलोदभवाम।।

पूरे श्रावण मास में इस मंत्र की 108 माला जाप होना आवश्यक है। श्रावण मास के पश्चात् यंत्र को व माला को पूजा स्थान में स्थापित कर दें और विवाह निश्चय होने के बाद इसे जल में प्रवाहित कर दें।

श्रावण मास माहात्म्य – पुत्र प्राप्ति प्रयोग

सामग्री : स्फटिक शिवलिंग, पुत्रजीवा माला।

जिस व्यक्ति के घर में पुत्र न हो या पुत्र उत्पन्न होने की सम्भावना नहीं हो रही हो अथवा संतान दीर्घायु नहीं होती हो तो उसके लिए यह प्रयोग महत्वपूर्ण है। इस प्रयोग को सम्पन्न करने से पुत्र यदि कहना नहीं मानता हो तो कहना मानने लगता है, वह आज्ञाकारी होता है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायक भी बन जाता है।

यह प्रयोग श्रावण के प्रथम सोमवार को प्रारंभ होता है और चारों सोमवारों को यह प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार यह प्रयोग मात्र चार बार ही पूरे महीने में किया जाता है।

साधक को चाहिए कि वह स्नान कर पूर्व की तरफ मुंह कर बैठ जाए। सामने लकड़ी के तख्ते पर एक थाली में चावल से त्रिकोण जिसका मुंह ऊपर की ओर हो बनाकर उसके मध्य में स्फटिक शिवलिंग स्थापित करें, और एक भोजपात्र पर निम्नलिखित मंत्र के सामने रख दें और फिर इसी मंत्र की पुत्रजीवा माला से 11 मालाएं जपें। इसके बाद नर्मदेश्वर शिवलिंग व भोजपत्र को पवित्र स्थान पर रख दें। यही प्रयोग श्रावण महीने में प्रत्येक सोमवार को करें।

अंतिम सोमवार को जब प्रयोग पूरा हो जाए तो उस भोज-पत्र को चांदी या सोने के ताबीज में डालकर स्वयं धारण कर लें या पत्नी को पहना दें तो निश्चय ही मनोकामना पूर्ण होती है।

यदि कोई साधक किसी दूसरे के लिए प्रयोग करना चाहे तो सकंल्प ले कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिए सम्पन्न कर रहा हूं।’

मंत्र

ॐ नमो नारसिंहाय हिरण्यकशिपोर्वक्ष: स्थल विदारणाय त्रिभुवन व्यापकाय भूतप्रेत पिशाच डाकिनी कुलनाशाय स्तम्भोद भवाय समस्त दोषान हर-हर विष-विष पच पच मथ मथ हन हन फट हुं फट ठः एहि रूद्रौ ज्ञापयति स्वाहा।

यह महत्वपूर्ण प्रयोग है और यह ताबीज किसी भी अवस्था में अपवित्र नहीं होता।

श्रावण मास माहात्म्य – कार्य सिद्धि प्रयोग

सामग्रीः शालिग्राम शिवलिंग।

साधक को चाहिए कि वह पश्चिम की तरफ मुंह करके बैठे और सामने शालिग्राम शिवलिंग को स्थापित कर ले। इसके बाद उसके सामने निम्न मंत्र की 11 मालाएं जपे। यह प्रयोग श्रावण महीने में प्रथम मंगलवार से प्रारंभ किया जाता है और 11 दिन का होता है।

प्रयोग करते समय घी का दीपक, अगरबत्ती जलती रहनी चाहिए। साधक को साधना काल में एक समय भोजन करना चाहिए और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इस प्रकार नित्य 11 मालाएं जपें। माला और आसन किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। साधना के समय मुंह उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। निम्न मंत्र का जाप करें।

ॐ नमो वीरायात्यंतबलपरामाय आगच्छ बलि गृहाण गृहाण कार्य साधय कार्य साधय हुं फट।

यदि अनुभूत प्रयोग है। इससे कुछ ही दिनों में साधक की अवश्य ही पूर्ण होने की सम्भावना बनने लगती है।

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Gyanchand Bundiwal
Gemologist, Astrologer. Owner at Gems For Everyone and Koti Devi Devta.
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