गुप्त नवरात्रि 2022

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गुप्त नवरात्रि बुधवार – 2 फरवरी 2022, गुप्त नवरात्रि प्रतिवर्ष दो बार माघ और आषाढ़ माह में आती हैं

गुप्त नवरात्रियों का महत्व चैत्र और शारदीय नवरात्रियों से भी अधिक हैं क्योंकि इनमें देवी अपने पूर्ण स्वरूप में विद्यमान रहती हैं जो प्रकट रूप में नहीं होता है। आइए जानें 20 खास बातें

  • गुप्त नवरात्रि में आसपास की प्रकृति में हरियाते जीवन में देवी का ही स्वरूप है। अन्न के खेतों में ललहलहाती फसल देवी का ही रूप है। आसमान से बरसती बूंदें भी देवी ही हैं। मुस्कुराते रंगबिरंगे फूलों में देवी का ही सौंदर्य है।
  • गुप्त नवरात्रियों में देवी शीघ्र प्रसन्न होती हैं, लेकिन इसमें सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि साधकों को पूर्ण संयम और शुद्धता से देवी आराधना करना होती हैं।
  • इस बार आषाढ़ माह की गुप्त नवरात्रि नों दिनों की है। 30 जुन को गुप्त नवरात्रि की शुरुआत होगी और 8 जुलाई को नवमी के साथ गुप्त नवरात्रि पूर्ण होगी।

गुप्त नवरात्रि में

  • इसके अलावा विनायक चतुर्थी, कुमार षष्ठी, विवस्वत सप्तमी जैसे पर्व भी आएंगे। इसी नवरात्रि में जगदीश रथयात्रा भी पूर्ण होगी
  • गुप्त नवरात्रि में अधिकांश तांत्रिक साधक देवी की आराधना कर अधिक से अधिक लाभ-पुण्य कमाने का प्रयास करते हैं। गुप्त नवरात्रि के दिन तंत्र-मंत्र सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन माने गए हैं। कई साधक इन दिनों में दसों महाविद्याओं की साधना भी करते हैं। इनसे न केवल स्वयं के जीवन की परेशानियों का अंत होता है, बल्कि वे दूसरों की भलाई के काम भी कर सकते हैं।
  • सुखी जीवन के लिए करें देवी आराधना गृहस्थ साधक जो सांसारिक वस्तुएं, भोग-विलास के साधन, सुख-समृद्धि और निरोगी जीवन पाना चाहते हैं उन्हें इन नौ दिनों में दुर्गासप्तशती का पाठ करना चाहिए।
  • यदि इतना समय न हों तो सप्तश्लोकी दुर्गा का प्रतिदिन पाठ करें। देवी को प्रसन्न करने के लिए और साधना की पूर्णता के लिए नौ दिनों में लोभ, क्रोध, मोह, काम-वासना से दूर रहते हुए केवल देवी का ध्यान करना चाहिए। कन्याओं को भोजन कराएं, उन्हें यथाशक्ति दान-दक्षिणा, वस्त्र भेंट करें।
  • नवरात्र गुप्त माघ माह, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 2 फरवरी से 10 फरवरी तक गुप्त नवरात्र मनाई जाएगी। कलश स्थापना मुहूर्त सुबह 06-59 से 08-31 बजे तक इस बार माघ नवरात्रि दस दिनों की होगी।
  • माघ गुप्त नवरात्र को खासतौर से तंत्र-मंत्र और सिद्धि-साधना आदि के लिए बहुत ही खास माना जाता है। दस महाविद्याएं मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां धूमावती, मां बगुलामुखी, मातंगी और कमला देवी हैं। इनकी खास आराधना गुप्त नवरात्र में की जाती है।

घट स्थापना शुभ मुहूर्त:
नवरात्रि शुरू – बुधवार 2 फरवरी 2022
नवरात्रि समाप्त – गुरुवार- 10 फरवरी 2022
कलश स्थापना मुहूर्त- सुबह 06- 59 मिनट से 08-31 मिनट तक

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  • गुप्त नवरात्रि की देवियां , मां काली, तारादेवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी माता, छिन्न माता, त्रिपुर भैरवी मां, धुमावती माता, बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी।
  • महत्व – देवी भागवत पुराण के अनुसार जिस तरह वर्ष में 4 बार नवरात्रि आती है और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के 9 रूपों की पूजा होती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्रि में 10 महाविद्याओं की साधना की जाती है।
  • गुप्त नवरात्रि विशेष कर तांत्रिक कियाएं, शक्ति साधनाएं, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है।
  • इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग दुर्लभ शक्तियों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। गुप्त नवरात्रि के दौरान कई साधक महाविद्या के लिए मां दुर्गा के सभी स्वरूपों का पूजन करते हैं।
  • अष्टमी या नवमी के दिन कन्या-पूजन के साथ नवरात्रि व्रत का उद्यापन करने की मान्यता है। नवरात्रि उद्यापन में कुंआरी कन्याओं को भोजन कराकर यथाशक्ति दान, दक्षिणा, वस्त्र और आभूषण तथा श्रृंगार सामग्री भेंट करने से मां भगवती की अपार कृपा मिलती है।
  • गुप्त नवरात्रि में भी नौ दिनों तक क्रमानुसार देवी के स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन दिनों में मां दुर्गा की आराधना गुप्त रूप से की जाएगी।
  • तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने के लिए ये महा अवसर है। किसी एकांत \
  • इन नौ दिनों तक माता के 32 नाम के साथ उनके मंत्र का 108 बार जाप भी करें।
  • सिद्धिकुंजिकास्तोत्र का 18 बार पाठ कीजिए
  • यदि संभव हो तो दुर्गासप्तशती का एक पाठ प्रातः और एक रात्रि में कीजिए।
  • ब्रम्ह मुहूर्त में श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने से दैहिक, दैविक और भौतिक तापों का नाश होता है।

कलश की स्थापना और उसके पूजन के समय पुजारी शास्त्रसम्मत कुछ मंत्रों का उच्चारण करते हैं।

कलशस्य मुखे विष्णु : कंठे रुद्र: समाश्रित।
मूल तस्य, स्थिति ब्रह्मा मध्ये मातगण: समाश्रित:।।
कलश के मुख में श्री विष्णु विराजमान हैं।
भ्रात: कान्चलेपगोपितबहिस्ताम्राकृते सर्वतो।
मा भैषी: कलश: स्थिरो भव चिरं देवालयस्योपरि।।
ताम्रत्वं गतमेव कांचनमयी कीर्ति: स्थिरा ते धुना।
नान्स्तत्त्वविचारणप्रणयिनो लोका बहिबरुद्धय:।।

कलश भारतीय संस्कृति का अग्रगण्य प्रतीक है इसलिए तो महत्वपूर्ण सभी शुभ प्रसंगों में पुण्याहवाचन कलश की साक्षी में तथा सान्निध्य में होता है।

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प्रत्येक शुभ प्रसंग या कार्य के आरंभ में जिस तरह विघ्नहर्ता गणोशजी की पूजा की जाती है उसी तरह कलश की भी पूजा होती है। देवपूजा के स्थान पर इस कलश को अग्रस्थान प्राप्त होता है। पहले इसका पूजन, फिर इसे नमस्कार और बाद में विघ्नहर्ता गणपति को नमस्कार! ऐसा प्राधान्यप्राप्त कलश और उसके पूजन के पीछे अति सुंदर भाव छिपा हुआ है।

स्वस्तिक चिह्न अंकित करते ही जिस तरह सूर्य आकर उस पर आसनस्थ होता है उसी तरह कलश को सजाते ही वरुणदेव उसमें विराजमान होते हैं। जो संबंध कमल-सूर्य का है वही संबंध कलश वरुण का है। वास्तव में कलश यानी लोटे में भरा हुआ या घड़े में भरा हुआ साधारण जल। परंतु कलश की स्थापना के बाद उसके पूजन के बाद वह जल सामान्य जल न रहकर दिव्य ओजस्वी बन जाता है।

तत्वायामि ब्रह्मणा वंदमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भि:।
अहेळमानो वरुणोहबोध्यु रुशंसा मा न आयु: प्रमोषी:।।

हे वरुणदेव! तुम्हें नमस्कार करके मैं तुम्हारे पास आता हूं। यज्ञ में आहुति देने वाले की याचना करता हूं कि तुम हम पर नाराज मत होना। हमारी उम्र कम नहीं करना आदि वैदिक दिव्य मंत्रों से भगवान वरुण का आवाहन करके उनकी प्रस्थापना की जाती है और उस दिव्य जल का अंग पर अभिषेक करके रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश पूजन की प्रार्थना के श्लोक भी भावपूर्ण हैं। उसकी प्रार्थना के बाद वह कलश केवल कलश नहीं रहता, किंतु उसमें पिंड ब्रह्मांड की व्यापकता समाहित हो जाती है

कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा।
ऋग्वेदोअथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण:।।
अंगैच्श सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शांतिपृष्टिकरी तथा।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।

हमारे ऋषियों ने छोटे से पानी के लोटे में सभी देवता, वेद, समुद्र, नदियां, गायत्री, सावित्री आदि की स्थापना कर पापक्षय और शांति की भावना से सभी को एक ही प्रतीक में लाकर जीवन में समन्वय साधा है। बिंदु में सिंधु के दर्शन कराए हैं।

कब होते हैं गुप्त नवरात्र

चैत्र और आश्विन मास के नवरात्र के बारे में तो सभी जानते ही हैं जिन्हें वासंती और शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है लेकिन गुप्त नवरात्र आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में मनाये जाते हैं। गुप्त नवरात्र की जानकारी अधिकतर उन लोगों को होती है जो तंत्र साधना करते हैं।

कब होते हैं गुप्त नवरात्र चैत्र और आश्विन मास के नवरात्र के बारे में तो सभी जानते ही हैं जिन्हें वासंती और शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है लेकिन गुप्त नवरात्र आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में मनाये जाते हैं। गुप्त नवरात्र की जानकारी अधिकतर उन लोगों को होती है जो तंत्र साधना करते हैं।

गुप्त नवरात्र पौराणिक कथा

गुप्त नवरात्र के महत्व को बताने वाली एक कथा भी पौराणिक ग्रंथों में मिलती है कथा के अनुसार एक समय की बात है कि ऋषि श्रंगी एक बार अपने भक्तों को प्रवचन दे रहे थे कि भीड़ में से एक स्त्री हाथ जोड़कर ऋषि से बोली कि गुरुवर मेरे पति दुर्व्यसनों से घिरे हैं जिसके कारण मैं किसी भी प्रकार के धार्मिक कार्य व्रत उपवास अनुष्ठान आदि नहीं कर पाती। मैं मां दुर्गा की शरण लेना चाहती हूं लेकिन मेरे पति के पापाचारों से मां की कृपा नहीं हो पा रही मेरा मार्गदर्शन करें। तब ऋषि बोले वासंतिक और शारदीय नवरात्र में तो हर कोई पूजा करता है सभी इससे परिचित हैं। लेकिन इनके अलावा वर्ष में दो बार गुप्त नवरात्र भी आते हैं इनमें 9 देवियों की बजाय 10 महाविद्याओं की उपासना की जाती है। यदि तुम विधिवत ऐसा कर सको तो मां दुर्गा की कृपा से तुम्हारा जीवन खुशियों से परिपूर्ण होगा। ऋषि के प्रवचनों को सुनकर स्त्री ने गुप्त नवरात्र में ऋषि के बताये अनुसार मां दुर्गा की कठोर साधना की स्त्री की श्रद्धा व भक्ति से मां प्रसन्न हुई और कुमार्ग पर चलने वाला उसका पति सुमार्ग की ओर अग्रसर हुआ उसका घर खुशियों से संपन्न हुआ ।

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अपनी राशि अनुसार पूजा चुने

मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान अन्य नवरात्रों की तरह ही पूजा करनी चाहिए। नौ दिनों के उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिप्रदा यानि पहले दिन घटस्थापना करनी चाहिए। घटस्थापना के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम के समय मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्र व्रत का उद्यापन करना चाहिए।

मेष मेष राशि के जातक शक्ति उपासना के लिए द्वितीय महाविद्या तारा की साधना करें। ज्योतिष के अनुसार इस महाविद्या का स्वभाव मंगल की तरह उग्र है। मेष राशि वाले महाविद्या की साधना के लिए इस मंत्र का जप करें।
मंत्र ह्रीं स्त्रीं हूं फट् ।

वृषभ राशि वाले धन और सिद्धि प्राप्त करने के लिए श्री विद्या यानि षोडषी देवी की साधना करें और इस मंत्र का जप करें।
मंत्र ऐं क्लीं सौ: ।

मिथुन राशि अपना गृहस्थ जीवन सुखी बनाने के लिए मिथुन राशि वाले भुवनेश्वरी देवी की साधना करें। साधना मंत्र इस प्रकार है।
मंत्र ऐं ह्रीं ।

कर्क राशि इस नवरात्रि पर कर्क राशि वाले कमला देवी का पूजन करें। इनकी पूजा से धन व सुख मिलता है। नीचे लिखे मंत्र का जप करें।
मंत्र ऊं श्रीं ।

सिंह राशि ज्योतिष के अनुसार सिंह राशि वालों को मां बगलामुखी की आराधना करना चाहिए। जिससे शत्रुओं पर विजय मिलती है।
मंत्र ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम: ।

कन्या राशि आप चतुर्थ महाविद्या भुवनेश्वरी देवी की साधना करें आपको निश्चित ही सफलता मिलेगी।
मंत्र ऐं ह्रीं ऐं

तुला राशि वालों को सुख व ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए षोडषी देवी की साधना करनी चाहिए।
मंत्र ऐं क्लीं सौ: ।

वृश्चिक राशि वाले तारा देवी की साधना करें। इससे आपको शासकीय कार्यों में सफलता मिलेगी।
मंत्र श्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं फट् ।

धनु राशि धन और यश पाने के लिए धनु राशि वाले कमला देवी के इस मंत्र का जप करें।
मंत्र श्रीं ।

मकर राशि के जातक अपनी राशि के अनुसार मां काली की उपासना करें।
मंत्र क्रीं कालीकाये नम: ।

कुंभ राशि वाले भी काली की उपासना करें इससे उनके शत्रुओं का नाश होगा।
मंत्र क्रीं कालीकाये नम: ।

मीन राशि के जातक सुख समृद्धि के लिए कमला देवी की उपासना करें।

मां दुर्गा के नवरुपों की उपासना निम्न मंत्रों के द्वारा की जाती है.
प्रथम दिन शैलपुत्री की एवं क्रमशः नवें दिन सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है

  1. शैलपुत्री माता का मंत्र
    वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
    वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥
  2. ब्रह्मचारिणी माता का मंत्र
    दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू ।
    देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥
  3. चन्द्रघण्टा माता का मंत्र
    पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता ।
    प्रसादं तनुते मह्यां चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥
  4. कूष्माण्डा माता का मंत्र
    सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।
    दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
  5. स्कन्दमाता माता का मंत्र
    सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया ।
    शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥
  6. कात्यायनी माता का मंत्र
    चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।
    कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥
  7. कालरात्रि माता का मंत्र
    एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।
    लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ॥
    वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा ।
    वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥
  8. महागौरी माता का मंत्र
    श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
    महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ॥
  9. सिद्धिदात्री माता का मंत्र
    सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
    सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी
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गुप्त नवरात्रि 2022 कब से शुरू हो रही है?

गुप्त नवरात्रि 2022 – बुधवार, 2 फरवरी 2022 शुरू हो रही

गुप्त नवरात्रि घट स्थापना शुभ मुहूर्त कब है?

घट स्थापना शुभ मुहूर्त –
कलश स्थापना मुहूर्त – बुधवार, 2 फरवरी 2022, सुबह 06:59 मिनट से 08:31 मिनट तक

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Gyanchand Bundiwal

Gemologist, Astrologer. Owner at Gems For Everyone and Koti Devi Devta.

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